September 25, 2026
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विधानसभा सत्र के दौरान नेता प्रतिपक्ष यशपाल का स्पीकर पर फूटा गुस्सा

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हुई तिखी नोक झोक और भयंकर बहस

नैनीताल। जब लोकतांत्रिक संस्थाओं की मर्यादाएँ टूटती हैं, जब संसदीय परंपराएँ तार-तार होने लगती हैं, तब स्वाभाविक रूप से सब्र का बाँध भी टूट जाता है। आज जो स्थिति सदन में बनी है, उसका कारण भी यही है कि माननीय सदस्यों द्वारा नियमों के तहत दी गई सूचनाओं को स्वीकार नहीं किया जा रहा है। यह पंचम विधानसभा का दसवाँ सत्र है और यदि इस बार के सत्र को भी जोड़ लिया जाए तो पिछले चार वर्षों में यह सदन कुल मिलाकर केवल 36 दिन ही चलेगा। यह स्थिति अपने आप में चिंताजनक है। विधानसभा लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण मंच है। यही वह स्थान है जहाँ जनता के प्रतिनिधि अपने क्षेत्र की समस्याओं और जनता की पीड़ा को सरकार के सामने रखते हैं। लेकिन यदि सदन इतने सीमित दिनों तक ही चलेगा तो प्रदेश से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीर चर्चा कैसे हो पाएगी? राज्य की जनता की विपक्ष से बहुत अपेक्षाएँ होती हैं। जनता चाहती है कि उनके मुद्दे इस सदन में मजबूती के साथ उठाए जाएँ। हम विपक्ष के सदस्य सीमित समय में भी पूरी जिम्मेदारी के साथ उन सभी विषयों को उठाने का प्रयास करते हैं जो हमारे संज्ञान में आते हैं और जो प्रदेश की जनता के हित से जुड़े होते हैं। नेता भाई प्रतिपक्ष यशपाल ने कहा बड़े खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि राज्य की पंचम विधानसभा में संसदीय परंपराओं को बुरी तरह तोड़ा गया है और कार्य संचालन नियमावली की भी अपेक्षित परवाह नहीं की गई है। हमारी यह मांग थी कि यह सत्र कम से कम 21 दिन का होना चाहिए, ताकि महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत चर्चा हो सके और सरकार जनता के प्रति अपनी जवाबदेही निभा सके।
लेकिन सरकार न केवल इस मांग को स्वीकार नहीं कर रही है, बल्कि उल्टा ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सदन की कार्यवाही को भी नियमानुसार संचालित नहीं किया जा रहा है।विधानसभा की अपनी परंपराएँ और मर्यादाएँ होती हैं। इन परंपराओं के अंतर्गत नेता प्रतिपक्ष के कुछ परंपरागत विशेषाधिकार भी होते हैं।
सदन की यह परंपरा रही है कि जब नेता प्रतिपक्ष अपनी बात रखते हैं तो उन्हें पूरा अवसर दिया जाता है। यहाँ तक कि विधानसभा अध्यक्ष भी सामान्यतः उन्हें बीच में नहीं टोकते, क्योंकि यह पद केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे विपक्ष की आवाज का प्रतिनिधित्व करता है।
दूसरी ओर, नेता प्रतिपक्ष भी सदन की मर्यादा और अपनी सीमाओं का पूरा ध्यान रखते हैं।
लेकिन अत्यंत दुर्भाग्य की बात है कि माननीय विधानसभा अध्यक्ष जी के मुख से एक बार भी “माननीय नेता प्रतिपक्ष” शब्द नहीं निकला। यह स्थिति केवल शब्दों का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह सदन की परंपराओं और लोकतांत्रिक मर्यादाओं से जुड़ा हुआ विषय है। आज तक किसी भी विधानसभा अध्यक्ष ने अध्यक्ष के आसन पर बैठकर इस प्रकार का व्यवहार नहीं किया है। अध्यक्ष का पद अत्यंत गरिमामय और निष्पक्ष माना जाता है, और उसी भावना के साथ इस पद से अपेक्षा की जाती है कि वह पूरे सदन को समान रूप से सम्मान दे।
हम सभी इस सदन की गरिमा और संसदीय शालीनता को बनाए रखने में विश्वास रखते हैं। लेकिन यदि संसदीय परंपराएँ लगातार टूटेंगी, यदि नियमों की अनदेखी होगी और यदि विपक्ष की आवाज को दबाने का प्रयास किया जाएगा, तो फिर हमें भी इन परंपराओं की रक्षा के लिए मजबूर होकर अपनी आवाज और अधिक मजबूती से उठानी पड़ेगी। क्योंकि जब संसदीय परंपराएँ टूटती हैं, तो उन्हें बचाने और उनकी रक्षा करने की जिम्मेदारी भी हम सभी जनप्रतिनिधियों की ही होती है।

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