October 19, 2026
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प्रो. वाई. पी. एस. पांगती की स्मृति में ‘बॉटनी एंड द बिगिनर’ पर विशेष व्याख्यान

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ऑनलाइन के माध्यम से किया गया


नैनीताल। सरोवर नगरी में डॉ. वाई. पी. एस. पांगती रिसर्च फाउंडेशन द्वारा प्रसिद्ध वनस्पति वैज्ञानिक एवं शिक्षाविद् स्वर्गीय प्रो. वाई. पी. एस. पांगती की स्मृति में प्रो. वाई. पी. एस. पांगती मेमोरियल लेक्चर का आयोजन ऑनलाइन माध्यम से किया गया। इस अवसर पर मुख्य वक्ता आई. डी. पांडे, आई.एफ.एस., पूर्व पीसीसीएफ एवं एच.ओ.एफ.एफ., उत्तराखंड ने “बॉटनी एंड द बिगिनर” विषय पर अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के प्रो. एस. सी. गरकोटी तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. पी. एल. उनियाल की गरिमामयी उपस्थिति रही।
कार्यक्रम का शुभारंभ वनस्पति विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. ललित तिवारी ने किया। उन्होंने स्वर्गीय प्रो. वाई. पी. एस. पांगती को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके व्यक्तित्व, कृतित्व एवं वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रो. पांगती का वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रकृति के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता तथा वनस्पति विज्ञान के प्रति उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा।
वाई. पी. एस. पांगती रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रो. बी. एस. कलाकोटी ने आठवें स्मृति व्याख्यान में उपस्थित सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया। अपने स्वागत संबोधन में उन्होंने कहा कि यह दिवस केवल प्रो. वाई. पी. एस. पांगती को स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि उनके मूल्यों, विचारों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को पुनः आत्मसात करने और आगे बढ़ाने का अवसर भी है।
डॉ. गोपाल सिंह रावत ने आज के मुख्य वक्ता श्री आई. डी. पांडे का परिचय प्रस्तुत किया। उन्होंने प्रो. वाई. पी. एस. पांगती को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि प्रो. पांगती का अपने कार्य के प्रति समर्पण, सादगीपूर्ण व्यक्तित्व और वैज्ञानिक दृष्टिकोण आज भी सभी के लिए प्रेरणास्रोत हैं।
मुख्य वक्ता श्री आई. डी. पांडे ने अपने व्याख्यान की शुरुआत यह कहते हुए की कि वे वनस्पति विज्ञानी नहीं हैं, लेकिन भारतीय वन सेवा में अपने लंबे कार्यकाल के दौरान उन्होंने प्रकृति और वनस्पतियों से बहुत कुछ सीखा। उन्होंने कहा कि वनस्पति विज्ञान का ज्ञान केवल पुस्तकों और वीडियो तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रत्यक्ष अवलोकन एवं व्यावहारिक अनुभव इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने में संकोच न करने और एक बिगिनर की पूर्वाग्रह-मुक्त सोच का लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने कोलेट का उदाहरण देते हुए बताया कि वनस्पति विज्ञानी न होते हुए भी उन्होंने अपने अवलोकन और रुचि के माध्यम से पौधों का महत्वपूर्ण दस्तावेजीकरण किया। श्री पांडे ने मुनस्यारी में कुटकी से जुड़े अपने अनुभव तथा उत्तराखंड में चीर, पॉपलर, क्लोनल प्लांटिंग और टिश्यू कल्चर से संबंधित व्यावहारिक अनुभव भी साझा किए। उन्होंने प्रकृति में पौधों और जीवों के पारस्परिक संबंधों को समझने तथा स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप अनुसंधान करने पर जोर दिया।
उन्होंने वनस्पति विज्ञान के तीन महत्वपूर्ण सिद्धांत अवलोकन, निष्कर्ष और कार्य पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि अनुसंधान को समाज, पर्यावरण और स्थानीय आवश्यकताओं से जोड़ना आवश्यक है। साथ ही, उन्होंने सेमिनार्स वर्कशॉप्स एंड कांफ्रेंस को विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जिज्ञासा, तर्कपूर्ण सोच और व्यावहारिक ज्ञान विकसित करने का प्रभावी माध्यम बताया।
प्रो. नीलू लोडियाल ने द्वितीय वक्ता प्रो. यूनियाल का परिचय कराया। अपने संबोधन में प्रो. यूनियाल ने प्रो. वाई. पी. एस. पांगती को विनम्र, समर्पित एवं अत्यंत ज्ञानवान व्यक्तित्व बताते हुए उनके साथ अपने अनुभव साझा। उन्होंने कहा कि प्रो. पांगती की पौधों के वैज्ञानिक ज्ञान के साथ-साथ उनके आर्थिक एवं व्यावहारिक उपयोगों में भी गहरी रुचि थी। सीमित संसाधनों के बावजूद उनके व्यापक शोध कार्य और प्रकाशन वैज्ञानिक समुदाय के लिए प्रेरणादायी हैं।
प्रो. यूनियाल ने वर्तमान समय में अनुप्रयुक्त एवं ट्रांसलेशनल रिसर्च, पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्स्थापन, वनस्पतियों की कार्यात्मक विविधता के आकलन तथा जलमार्गों के मानचित्रण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने स्मृति व्याख्यान का हिस्सा बनने पर आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह सम्मान उन्हें आगे भी शोध के क्षेत्र में योगदान देने के लिए प्रेरित करेगा।
प्रो. भावना पाठक ने सत्र के तृतीय वक्ता प्रो. सतीश गारकोटी का परिचय कराया। अपने संबोधन में प्रो. गारकोटी ने स्मृति व्याख्यान के अवसर पर आयोजित इस वर्चुअल सभा का हिस्सा बनने को अपना सौभाग्य बताया। उन्होंने कहा कि प्रो. पांगती की तीन पीढ़ियों के विद्यार्थियों और सहकर्मियों के मन में उनके प्रति समान सम्मान और आत्मीयता है। वे अत्यंत सहज और सुलभ व्यक्तित्व के धनी थे, जिनसे कोई भी व्यक्ति, चाहे वह उनका विद्यार्थी हो या न हो, मार्गदर्शन प्राप्त कर सकता था।
उन्होंने प्रो. पांगती के गहन वनस्पति ज्ञान और पौधों की पहचान करने की अद्भुत क्षमता का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने कई नई प्रजातियों की पहचान और रिपोर्टिंग की। उन्होंने कहा कि जहाँ टैक्सोनॉमिस्ट किसी नमूने की पहचान में महीनों लगा सकते हैं, वहीं प्रो. पांगती सहजता से बातचीत के दौरान ही पौधे की पहचान कर लेते थे।
प्रो. गरकोटी ने उन्हें एक उत्कृष्ट प्राकृतिक इतिहासकार और पारिस्थितिकीविद् बताते हुए कहा कि उनकी प्रजाति-पहचान की विशेषज्ञता ने पारिस्थितिकीविदों को विभिन्न प्रजातियों की गतिशीलता और उनके पारस्परिक संबंधों को समझने में महत्वपूर्ण आधार प्रदान किया।
वाई. पी. एस. पांगती स्मृति व्याख्यान के दौरान अपने-अपने क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए तीनों वक्ताओं को वाई. पी. एस. पांगती स्मृति पुरस्कार 2026 का प्रमाण-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के अंत में डॉ. श्रीकर पंत ने सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया। डॉ यशपाल सिंह पांगती जी को नमन करते हुए श्रद्धांजलि दी गई । श्री आई डी पांडे ,डॉ पी एल उनियाल दिल्ली विश्वविद्यालय तथा डॉ सतीश चंद्र गरकोटी जे एन यू को 2026 का डॉ वाई पी एस पांगती अवार्ड से सम्मानित किया गया ।

कार्यक्रम के दौरान डॉ. बी. एस. कलाकोटी ने जलवायु कार्रवाई के महत्व पर आधारित अपनी स्वरचित प्रेरणादायक कविता प्रस्तुत की।
इस अवसर पर डॉ. सामंत, डॉ. हरि एस. बिष्ट, डॉ. चंद्रशेखर, डॉ. एस. डी. तेवारी ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रो. वाई. पी. एस. पांगती के व्यक्तित्व एवं उनके वैज्ञानिक योगदान को स्मरण किया।
प्रो. ललित तेवारी ने पूरे कार्यक्रम का सफलतापूर्वक संचालन किया। उन्होंने प्रो. वाई. पी. एस. पांगती के प्रति अपनी श्रद्धा एवं सम्मान व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें उनका विद्यार्थी होने पर गर्व है। कार्यक्रम में डॉ एस एस सामंत ,डॉ सतीश गरकोटी ,पूर्व हाफ धनंजय मोहन , लता निर्बल ,डॉ नवीन पांडे ,प्रॉफ अनिल जोशी ,डॉ पेनी जोशी ,डॉ रीमा मिश्रा ,डॉ दीप्ति नेगी ,डॉ गीता तिवारी ,डॉ एस डी तिवारी ,डॉ एच एस बिष्ट , डॉ समीर पांडे ,डॉ ज्योति कांडपाल ,डॉ गिरीश जोशी , डॉ अनिल जोशी डॉ ज्योति कांडपाल , डॉ मनोज बिष्ट , डॉ भावना पाठक ,डॉ नीलू लोध याल आदि शामिल रहे।

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