March 27, 2026
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विश्व साहित्य की संकल्पना अनुवाद के बिना संभव नहीं: सरबजीत गरचा

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नैनीताल। सरोवर नगरी के समीपवर्ती कुमाऊँ विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजनपीठ में कवयित्री महादेवी वर्मा के 119वें जन्मदिन के अवसर पर
उक्त विचार चंडीगढ़ साहित्य अकादमी से सम्मानित कवि, लेखक, संपादक, अनुवादक और प्रकाशक सरबजीत गरचा ने समकालीन वैश्विक काव्य संसार और हिंदी : संवाद एवं अनुवाद’ विषयक बारहवां महादेवी वर्मा स्मृति व्याख्यान देते हुए व्यक्त किए और कहा विश्व साहित्य की कल्पना को साकार करने में अनुवाद सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपकरण है। मनुष्य अपने मनोभावों को जिन विभिन्न भाषा-बोलियों में व्यक्त करता है, अनुवाद उनके बीच संवाद को संभव बनाता है। यह संवाद ही वैश्विकता का आधार है। अनुवाद के बिना विश्व साहित्य की संकल्पना संभव नहीं है। हमें विश्व नागरिक बनाने में अनुवाद की अनिवार्यता स्वयंसिद्ध है।
उन्होंने आज की विश्व कविता के प्रमुख सरोकार पहचान और विस्थापन, युद्ध और प्रतिरोध, बहुस्वरवाद, डिजिटल कविता आदि का जिक्र करते हुए कहा कि अनुवाद केवल भाषाओं और साहित्य के बीच ही नहीं बल्कि संस्कृतियों के बीच भी समझ पैदा करते है।
श्री गरचा ने वैश्विक स्तर पर चर्चित हिंदी कवि अज्ञेय, कुँवर नारायण, केदारनाथ सिंह, मंगलेश डबराल आदि का उल्लेख करते हुए कहा कि हिंदी सहित भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी सहित विदेशी भाषाओं के बीच बहुतायत में अनुवाद हुआ है। लंबे समय तक उपनिवेश रहने के कारण यहाँ आधुनिकता और अनुवाद का विकास साथ-साथ हुआ।
विशिष्ट अतिथि उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी ने कहा कि हिंदी में विश्व साहित्य के अनुवाद की एक सुदृढ़ परंपरा रही है। संसार के लगभग सभी प्रमुख कवियों के अनुवाद हिंदी में उपलब्ध हैं। दुनिया भर की भाषाओं में रचे गए साहित्य का अनुवाद ही उसकी सर्वत्र उपलब्धता का आधार है। यही कारण है कि अनुवाद साहित्य के वैश्विक प्रसार का एक प्रमुख आधार है।
स्वागत संबोधन में महादेवी वर्मा सृजनपीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य ने कहा कि विश्व साहित्य में अनुवाद का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है और तमाम तरह की समस्याओं और आक्षेपों के बावजूद दुनिया की सभी भाषाओं के बीच अनुवाद की काफी पुष्ट परंपरा रही है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग, डीएसबी परिसर की वरिष्ठ प्राध्यापक प्रो. चन्द्रकला रावत ने कहा कि विश्व साहित्य के अनुवादों से हिंदी साहित्य को नवीन दृष्टि प्राप्त हुई और हिंदी साहित्यकारों के रचना संसार को विस्तृत आयाम मिला। अनुवाद केवल भाषा परिवर्तन नहीं बल्कि वैश्विक संवाद के लिए अनिवार्य है। मुख्य वक्ता का परिचय अंग्रेजी विभाग, डीएसबी परिसर की प्राध्यापक प्रो. हरिप्रिया पाठक ने प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में मुख्य व्याख्याता सरबजीत गरचा से प्रतिभागी प्राध्यापक, शोधार्थी तथा विद्यार्थियों का परिसंवाद आयोजित किया गया। संचालन पीठ समन्वयक मोहन सिंह रावत और धन्यवाद अतिथि व्याख्याता मेधा नैलवाल ने व्यक्त किया।
इससे पूर्व दीप प्रज्वलन और महादेवी के चित्र पर माल्यार्पण से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। पीठ निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य ने अतिथियों का शाॅल ओढ़ाकर, पुष्प गुच्छ और स्मृति-चिन्ह भेंटकर स्वागत किया।
इस अवसर पर राजकीय महाविद्यालय रामगढ़ के प्राचार्य डाॅ. नगेन्द्र द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार अम्बरीश कुमार, पूर्व जिला पंचायत सदस्य अनिल आर्य सहित उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डाॅ. सुचित्रा अवस्थी, डाॅ. राजेन्द्र कैड़ा, डाॅ. अनिल कार्की, डाॅ. कुमार मंगलम सहित डाॅ. शशि पाण्डे, डाॅ. कंचन आर्या, डाॅ. मथुरा इमलाल, डाॅ. माया शुक्ला, डाॅ. हरीश चन्द्र जोशी, डाॅ. संध्या गड़कोटी, डाॅ. नीमा पंत, डाॅ. संदीप तिवारी, डाॅ. शिव प्रकाश त्रिपाठी, सविता वर्मा, हिमांशु डालाकोटी, निर्मला कपिल, अरूणेश शुक्ल, कृष्ण चन्द्र जोशी, नंदकिशोर जोशी, महेश जोशी, हिमांशु विश्वकर्मा, ललित मोहन, सृष्टि गंगवार, शिवानी शर्मा, देवेंद्र कुमार, रोहित रौतेला, धनंजय पाठक, गुंजिता पंत, पाखी पाण्डे, प्रकृति सिंह, बहादुर सिंह कुँवर, ललित नेगी आदि उपस्थित धे।

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