September 26, 2026
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दो सगी बहनों का खून से राष्ट्रपति को लिखा पत्र सवाल:

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अंकिता भण्डारी को न्याय न मिलने पर व्यवस्था के विरुद्ध सबसे कठोर प्रतिरोध

अल्मोड़ा नैनीताल। उत्तराखंड की धरती से उठी एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने सरकार, व्यवस्था और समाज—तीनों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। दो सगी बहनों ने अपने खून से महामहिम राष्ट्रपति को पत्र लिखकर यह सवाल किया है कि जब एक बेटी को न्याय नहीं मिलता, तो देश की बाकी बेटियाँ कैसे सुरक्षित मानी जाएँ। यह कोई प्रदर्शन मात्र नहीं, बल्कि उस हताशा, पीड़ा और आक्रोश का प्रतीक है, जो अंकिता भण्डारी हत्याकांड के बाद प्रदेश के जनमानस में लगातार गहराता जा रहा है।

खून से पत्र लिखने वाली छोटी बहन संजना, काशीपुर स्थित तारावती बालिका विद्या मंदिर की छात्रा है। वह अभी कक्षा 10 में पढ़ती है, लेकिन उसके सवाल सत्ता के शीर्ष तक पहुँच चुके हैं। संजना और उसकी बड़ी बहन कुसुम लता बौड़ाई, दोनों सल्ट विधानसभा, जनपद अल्मोड़ा की मूल निवासी हैं—एक पहाड़ी परिवार की बेटियाँ, जिन्होंने यह दिखा दिया कि जब व्यवस्था बहरी हो जाए, तो बेटियाँ अपनी देह की आख़िरी हद तक जाकर सवाल करती हैं।

बड़ी बहन कुसुम लता बौड़ाई केवल एक आम नागरिक नहीं हैं। वह किसान मंच की प्रदेश प्रवक्ता होने के साथ-साथ पहाड़ों फाउंडेशन की अध्यक्ष भी हैं। सामाजिक आंदोलनों से जुड़ी कुसुम लता ने जब देखा कि अंकिता भण्डारी को न्याय दिलाने की हर संवैधानिक कोशिश अनसुनी होती जा रही है, तो उन्होंने विरोध का वह रास्ता चुना, जिसे देखकर पूरा समाज सन्न रह गया। अपने खून से लिखा गया यह पत्र उन्होंने “निवेदन” नहीं, बल्कि सत्ता के मुँह पर तमाचा बताया है।

पत्र में साफ शब्दों में लिखा गया है कि यह केवल अंकिता की हत्या का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की अंतरात्मा की हत्या है। जब सबूतों के नष्ट होने की बातें सामने आती हों, जब गवाहों पर दबाव की आशंकाएँ हों, जब प्रभावशाली लोगों को संरक्षण मिलने के आरोप हों और फिर भी न्याय में लगातार देरी हो—तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कानून सबके लिए बराबर है? बहनों का कहना है कि यह खून से लिखा पत्र उस व्यवस्था के खिलाफ अंतिम चेतावनी है, जो अब तक संवेदनहीन बनी हुई है।

कुसुम लता बौड़ाई ने सरकार को घेरते हुए कहा कि लंबे समय से “जाँच चल रही है” जैसे जुमलों के सहारे जनता को चुप कराने की कोशिश की जा रही है। लेकिन अब हालात ऐसे हो चुके हैं कि छात्राएँ, बहनें और बेटियाँ अपने खून से सवाल लिखने को मजबूर हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब तक अंकिता भण्डारी को निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध न्याय नहीं मिलता, तब तक यह संघर्ष रुकेगा नहीं—चाहे उसे कितनी भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।

इस खून से लिखे पत्र ने सोशल मीडिया से लेकर सामाजिक संगठनों तक गहरी हलचल पैदा कर दी है। महिला अधिकार समूहों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने इसे न्याय के लिए अब तक का सबसे झकझोर देने वाला प्रतीकात्मक विरोध बताया है। लोगों का कहना है कि यह घटना बताती है कि सरकार और व्यवस्था ने जनता को किस हद तक निराश कर दिया है, जब एक नाबालिग छात्रा को भी अपने खून से राष्ट्रपति से न्याय माँगना पड़ रहा है।

दो सगी बहनों का यह कदम सरकार के लिए एक कठोर आईना है। यह सवाल अब सिर्फ अदालतों में नहीं, बल्कि सड़कों, स्कूलों, घरों और समाज के विवेक में गूंज रहा है—क्या न्याय पाने के लिए बेटियों को खून से लिखना पड़ेगा? अंकिता भण्डारी को न्याय दिलाने की यह लड़ाई अब किसी एक परिवार या संगठन की नहीं रही। यह पूरे समाज की आवाज़ बन चुकी है, और यह आवाज़ तब तक गूंजती रहेगी, जब तक सत्ता जवाब देने को मजबूर नहीं हो जाती।

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