March 22, 2026
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डीएसबी कैंपस से दुनिया तक: सुबह 3 बजे की पढ़ाई और} अनुशासन से गढ़े गए वैश्विक वैज्ञानिक डॉ. रूप सिंह भाकुनी ने कहा

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पहाड़ का पानी और डीएसबी की मिट्टी में वह शक्ति है

जो आपको दुनिया में कहीं भी सफलता दिला सकती है

नैनीताल। सरोवर नगरी में कुमाऊँ विश्वविद्यालय के डीएसबी कैंपस में रसायन विज्ञान विभाग द्वारा आयोजित विशेष व्याख्यान में कैंपस के गौरव, विश्वप्रसिद्ध वैज्ञानिक, उद्यमी और लेखक डॉ. रूप सिंह भाकुनी ने “फोंड मेमोरीज़ फ्रॉम द कॉरिडोर्स ऑफ डीएसबी कैंपस” विषय पर अपने जीवन, संघर्ष, शोध और वैश्विक उपलब्धियों का प्रेरक विवरण विद्यार्थियों के साथ साझा किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. दीवान सिंह रावत ने की।
डॉ. भाकुनी ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए बताया कि उनकी वैज्ञानिक यात्रा की नींव डीएसबी कैंपस में ही पड़ी। उन्होंने 1958 में डीएसबी कैंपस से बी.एससी. और एम.एससी. (रसायन विज्ञान) पूर्ण की। एम.एससी. की प्रोजेक्ट वर्क से ही उनका पहला शोधपत्र प्रकाशित हुआ। एम.एससी. परीक्षा में उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय में तृतीय स्थान प्राप्त किया, जिसे वे अपने जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ बताते हैं। इसके बाद उन्होंने 1959 में IIT खड़गपुर से एम.टेक. किया। उच्च शिक्षा के प्रति अपने जुनून के साथ वे अमेरिका गए और वहाँ से आरोन यूनिवर्सिटी यूएसए से पीएच.डी. पूरी की।
उन्होंने आगे बताया कि उनके शोध कौशल और तकनीकी दक्षता ने उन्हें गुडईयर टायरस में उच्च पद तक पहुँचाया, जहाँ वे आगे बढ़ते हुए मैनेजिंग डायरेक्टर के पद तक पहुँचे। वे 10 देशों में गुडइयर की औद्योगिक इकाइयाँ स्थापित करने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले भारतीयों में से एक रहे। उनका पहला बड़ा वैज्ञानिक आविष्कार स्थायी पॉलिएस्टर (स्टेबल पॉलिएस्टर) की खोज थी, जो आज भी विश्वभर की टायर उद्योग में उपयोग होने वाली अत्यंत महत्वपूर्ण तकनीक है। व्याख्यान के दौरान उन्होंने अपने छात्र जीवन की कठोर और अनुशासित दिनचर्या साझा करते हुए बताया कि वे प्रतिदिन सुबह 3 बजे उठकर अध्ययन करते थे, फिर फुटबॉल का अभ्यास करते थे और समय से कक्षाओं व प्रयोगशाला में पहुँचकर पूरी निष्ठा से प्रयोग और अध्ययन किया करते थे। उन्होंने कहा कि अनुशासन, समय-प्रबंधन और निरंतर परिश्रम ही उनकी सफलता के मूल स्तंभ रहे, जिनके चलते उन्हें वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय में सम्मान प्राप्त हुआ और वे 70 से अधिक अंतरराष्ट्रीय पेटेंट के धारक बन सके। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा, “सपने जरूर देखें, लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए ईमानदार प्रयास, कठोर परिश्रम और दृढ़ अनुशासन अनिवार्य हैं। पहाड़ का पानी और डीएसबी की मिट्टी में वह शक्ति है, जो आपको दुनिया में कहीं भी सफलता दिला सकती है।”
कुलपति प्रो. दीवान सिंह रावत ने डॉ. भाकुनी के योगदान को विश्वविद्यालय और राज्य के लिए अमूल्य बताते हुए कहा कि ऐसे पूर्व छात्र किसी भी संस्थान की वास्तविक पूँजी होते हैं। उन्होंने कहा कि डॉ. भाकुनी जैसे अलुम्नाई विश्वविद्यालय का नाम न केवल देश में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गौरव से ऊँचा उठाते हैं। कुलपति ने आगे घोषणा की कि विश्वविद्यालय में अब अलुम्नाई संवाद कार्यक्रमों का नियमित आयोजन किया जाएगा, ताकि छात्र ऐसे प्रतिष्ठित पूर्व छात्रों के अनुभव और मार्गदर्शन से लाभान्वित हो सकें।

विज्ञान संकायाध्यक्ष एवं रसायन विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. चित्रा पांडे ने डॉ. भाकुनी का स्वागत करते हुए उन्हें विभाग का गौरव बताया और कहा कि उनका जीवन विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा और ऊर्जा का स्रोत है।

इस अवसर पर श्री चंदन डांगी की उपस्थिति भी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही, जो हुंडई में वरिष्ठ मार्केटिंग हेड रह चुके हैं। उन्होंने भी विद्यार्थियों को संबोधित किया और अपनी पुस्तक “उत्तराखंड की प्रतिभाएँ” के माध्यम से उत्तराखंड के युवाओं की संभावनाओं और उपलब्धियों पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम में निदेशक डॉ. नीता बोरा शर्मा, प्रो. एच.सी.एस. बिष्ट, प्रो. संजय पंत, प्रो. शुचि बिष्ट, प्रो. सावित्री कैरा, प्रो. एम.सी. जोशी, प्रो. रीतेश साह, प्रो. एन.जी. साहू, प्रो. अमित जोशी, डॉ. सुहेल जावेद, डॉ. मनोज धौनी, डॉ. पैनी जोशी, डॉ. गिरीश खर्कवाल, डॉ. दीपशिखा जोशी, डॉ. आंचल अनेजा, डॉ. आकांक्षा रानी और डॉ. भावना पंत सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन प्रो. ललित तिवारी ने किया।

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