जामोवी के माध्यम से सांख्यिकीय विश्लेषण पर द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशालादिवस पर हुआ उद्घाटन सत्र


नैनीताल। सरोवर नगरी में जामोवी के माध्यम से सांख्यिकीय विश्लेषण पर द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला
दिवस 1: 5 अक्टूबर 2026 (सोमवार)
पूर्वाह्न 10:00–11:00 बजे – उद्घाटन सत्र
प्रो. ललित ने मुख्य वक्ता प्रो. नीता माथुर, संरक्षक प्रो. ज्योति जोशी, प्रो. एम.सी. जोशी, संसाधन व्यक्तियों डॉ. अश्विनी कुमार एवं डॉ. वीरेन्द्र प्रताप यादव तथा आयोजन सचिवों प्रो. दीपक पालीवाल एवं डॉ. सरोज पालीवाल का स्वागत करते हुए सत्र का शुभारंभ किया और उसका संचालन किया। उन्होंने शोध तथा सांख्यिकीय विश्लेषण के महत्व को रेखांकित किया, विशेषकर जेन-ज़ी (Gen Z) के इस दौर में, और बताया कि सांख्यिकी उनके शोध कार्य में किस प्रकार और अधिक सहायक हो सकती है।
इसके पश्चात दीप प्रज्वलन हुआ। प्रो. ललित ने प्रो. ज्योति जोशी, प्रो. नीता माथुर, प्रो. दीपक पालीवाल और प्रो. एम.सी. जोशी को दीप प्रज्वलन के लिए आमंत्रित किया। इसके बाद राष्ट्रगीत, फिर राष्ट्रगान और तत्पश्चात कुमाऊँ विश्वविद्यालय का कुलगीत प्रस्तुत किया गया।
इसके बाद संरक्षक प्रो. ज्योति जोशी को अपने विचार रखने के लिए मंच पर आमंत्रित किया गया। उन्होंने सभी गणमान्य अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए अपनी बात आरंभ की। उन्होंने शोध में प्रौद्योगिकी (सांख्यिकीय उपकरणों) की भूमिका पर बल दिया, विशेषकर सामाजिक विज्ञान विषयों के लिए इसकी महत्ता बताई तथा कार्यशाला के महत्व पर भी जोर दिया। अंत में उन्होंने इस सार्थक कार्यशाला के आयोजन के लिए आयोजन सचिव प्रो. दीपक पालीवाल को धन्यवाद दिया और प्रतिभागियों से इसका पूरा लाभ उठाने का आग्रह किया।
तत्पश्चात सम्मान समारोह हुआ। प्रो. ज्योति जोशी ने प्रो. नीता माथुर को पुष्पगुच्छ एवं स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया; प्रो. दीपक पालीवाल और डॉ. सरोज पालीवाल ने प्रो. एम.सी. जोशी को सम्मानित किया; डॉ. अर्चना ने डॉ. अश्विनी कुमार को सम्मानित किया; डॉ. प्रियंका ने डॉ. वीरेन्द्र प्रताप यादव को सम्मानित किया; और अंत में डॉ. प्रियंका, प्रो. दीपक पालीवाल तथा डॉ. सरोज पालीवाल ने प्रो. ज्योति जोशी को सम्मानित किया।
प्रो. ललित ने पुनः मंच संभाला और हमारे दैनिक जीवन में सांख्यिकी के महत्व पर बल दिया। उन्होंने समझाया कि मानसून तथा जनसंख्या का पूर्वानुमान कितना महत्वपूर्ण है।
इसके बाद प्रो. दीपक पालीवाल को अपने विचार रखने के लिए मंच पर बुलाया गया। उन्होंने उद्घाटन सत्र के संचालन के लिए प्रो. ललित का धन्यवाद किया। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे कार्यशाला का ध्यानपूर्वक अनुसरण करें, क्योंकि यह उनके भावी शोध के लिए महत्वपूर्ण है, और कहा कि प्रायोगिक अभ्यास (हैंड्स-ऑन) से उनके कौशल में और निखार आएगा। इसके बाद प्रो. एम.सी. जोशी ने अपनी बात रखी और बताया कि डेटा साइंस का आधार सांख्यिकी ही है।
सत्र के अंत में प्रो. नीता माथुर ने मंच संभाला। उन्होंने यह प्रश्न पूछकर अपनी बात आरंभ की, “आप में से कितने लोग सांख्यिकी से डरते हैं?”, ताकि यह अनुमान लगाया जा सके कि कितने प्रतिभागी इससे भयभीत हैं। उन्होंने स्मरण कराया कि अपने शोध-कार्य के आरंभिक दिनों में वे और उनके साथी भी सांख्यिकी से डरते थे। किंतु शोध, विशेषकर समाजशास्त्र में, तेज़ी से अधिक डेटा-केंद्रित और विश्लेषण-प्रधान होता जा रहा है। सांख्यिकीय परिणामों को तथ्य माना जाता है, जिससे ऐसे विश्लेषण का महत्व और बढ़ जाता है।
उन्होंने सांख्यिकीय उपकरणों के क्षेत्र में जामोवी द्वारा भरी जाने वाली रिक्ति का वर्णन किया। उनके अनुसार एक ओर SPSS जैसे सशुल्क उपकरण बहुत महंगे हैं, तो दूसरी ओर R जैसे ओपन-सोर्स उपकरणों के लिए कोडिंग का गहन ज्ञान आवश्यक है। इन दोनों के बीच की इस खाई को जामोवी पाटता है। उन्होंने बताया कि जामोवी सॉफ़्टवेयर मुख्यतः तीन सिद्धांतों पर आधारित है: (i) प्रौद्योगिकी उपयोगकर्ता-अनुकूल होनी चाहिए, (ii) ज्ञान निःशुल्क होना चाहिए, और (iii) ध्यान सूत्रों के बजाय परिणामों पर होना चाहिए।
उन्होंने यह भी बताया कि जामोवी की कुछ सीमाएँ हैं: डेटा बड़ा होने पर यह अपर्याप्त सिद्ध होता है, तथा व्याख्या, जो शोधकर्ता की सूझ-बूझ पर निर्भर करती है, जामोवी के दायरे में नहीं आती। उन्होंने अपने वक्तव्य का समापन यह कहते हुए किया कि मात्रात्मक और गुणात्मक डेटा विश्लेषण एक-दूसरे का स्थान न लें, बल्कि एक-दूसरे के पूरक बनें, विशेषकर सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में।
अगला सत्र: सत्र II – अवधारणा सत्र (Concept Session)
डॉ. अश्विनी कुमार: उन्होंने अवधारणा सत्र की रूपरेखा का अवलोकन प्रस्तुत किया। उन्होंने उपकरणों के महत्व पर चर्चा की और कहा कि डेटा तो हमेशा उपलब्ध रहेगा। शोध वैज्ञानिक अन्वेषण की एक प्रक्रिया है; ध्यान रहे कि शोध पूरी तरह प्रक्रिया ही है। मनुष्य लंबे समय तक जटिलता को सहन नहीं कर पाते। वैज्ञानिक समुदाय केवल परिणामों के बजाय शोध की प्रक्रिया पर अधिक ध्यान देता है, जिससे शोध अधिक प्रभावशाली बनता है। उद्देश्य यह है कि हम डेटा और अपने स्वयं के विश्लेषण के साथ सहज हो सकें। अच्छा बनाम खराब शोध: अच्छा शोध तार्किक, तथ्यों पर आधारित और पुनरावृत्ति-योग्य (replicable) होना चाहिए।
सांख्यिकी न केवल डेटा एकत्र करने और उसका विश्लेषण करने में सहायक है, बल्कि संख्याओं को अर्थ देने में भी सहायक है। सांख्यिकी का उपयोग आँख मूँदकर नहीं करना चाहिए; इसके पीछे तार्किक चिंतन होना चाहिए। शोध चर (variable) से आरंभ होता है; फिर विचरण (variation) की पहचान और माप के लिए सांख्यिकी आती है। उन्होंने R में प्रयुक्त सिंटैक्स की जटिलता की ओर ध्यान दिलाया और बताया कि जामोवी वास्तव में पृष्ठभूमि में R का ही उपयोग करता है। उन्होंने कहा कि प्रसरण (variance) सभी सांख्यिकीय तकनीकों की बुनियादी इकाई है।
चर → विचरण → प्रसरण
उन्होंने समष्टि (population) और प्रतिदर्श (sample) की मूल बातों पर भी चर्चा की तथा बताया कि मानक विचलन जैसे सूत्र समष्टि और प्रतिदर्श के लिए किस प्रकार भिन्न होते हैं। उन्होंने वर्णनात्मक सांख्यिकी क्या है, यह समझाया।
डॉ. वीरेन्द्र प्रताप यादव: उन्होंने डेटा के त्वरित विश्लेषण में सॉफ़्टवेयर के महत्व पर चर्चा की, जो उनके समय में उपलब्ध नहीं था। उन्होंने सांख्यिकी में पूर्वानुमान पर भी बात की। समूहों के चयन के समय हमारा लक्ष्य प्रसरण को अधिकतम तथा त्रुटि-प्रसरण को न्यूनतम करना होता है। बाह्य त्रुटि (extraneous error) को न्यूनतम किया जाना चाहिए (दोनों समूह समान हों) (मैक्स-मिन सिद्धांत)। उन्होंने कक्षा में प्रतिभागियों के वज़न का उदाहरण देकर केंद्रीय प्रवृत्ति को समझाया।
उन्होंने समूह-अंतर्गत (within-group) और समूहों के बीच (between-group) विचरण पर भी बात की तथा t-परीक्षण जैसे सूत्रों में मानक विचलन के महत्व पर प्रकाश डाला। आवृत्ति बंटन (frequency distribution) को भी छुआ गया तथा प्रसामान्य प्रायिकता वक्र (normal probability curve) की भी चर्चा हुई। उन्होंने प्रसामान्य बंटन के ग्राफ़ के माध्यम से परिवर्तनशीलता (माध्य ± सिग्मा) दर्शाई। एकचर (univariate) एवं द्विचर (bivariate) वर्णनात्मक सांख्यिकी पर भी चर्चा हुई। उन्होंने तनाव और प्रदर्शन के उदाहरण द्वारा अरैखिक संबंध पर भी संक्षेप में बात की।
डॉ. अश्विनी कुमार: उन्होंने मापन के स्तरों (पैमानों) पर चर्चा की — चार स्तर: नाममात्र (nominal), क्रमसूचक (ordinal), अंतराल (interval) और अनुपात (ratio)। विश्लेषण के लिए डेटा को मात्रात्मक रूप देना महत्वपूर्ण है।

























