जंगल की आग पर विशेष

नैनीताल। उत्तराखंड में 2026 में रुद्रप्रयाग मे 20 घटनाएं ,अल्मोड़ा लोधिआ ,नैनीताल का गेठिया ,गंगोलीहाट के जंगल फिर जलने लगे है। जिससे लगभग 41 एकड़ भूमि प्रभावित हुई है। कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ललित तिवारी ने जंगलों में लग रही आज को लेकर कुछ आंकड़े दिए हैं और बताया
हिमालयी राज्यों में अब शीत काल के बाद ग्रीष्मकालीन में आग लगने लगी है । इस आग से अनगिनत पेड़-पौधे, दुर्लभ वनस्पतियां और वन्यजीव या तो जलकर मर जाते हैं या अपने प्राकृतिक आवास खो देते हैं तथा जो जंगल कार्बन डाइऑक्साइड को शोषित करते है वो आग लगने से संचित कार्बन और भारी मात्रा में जहरीली गैसें हवा में छोड़ते हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देते हैं।धुआं सांस लेने लायक नहीं होता, जिससे पी एम 2.5 जैसे प्रदूषक बढ़ते हैं और स्वास्थ्य संबंधी बीमारियां पैदा होती हैं।
आग के तेज तापमान से मिट्टी के पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं, जिससे मिट्टी बंजर हो सकती है और कटाव बढ़ जाता है।
आर्थिक रूप से लकड़ी के भंडार, फसलों, और बिजली ग्रिड जैसी महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों को नष्ट कर देती है। वनों के नष्ट होने से जल स्रोत सूख सकते हैं और पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है।
जंगल की अधिकांश आग मानवीय लापरवाही (जैसे जलती सिगरेट, बीड़ी या जान बूझकर ) के कारण लगती है। और वैश्विक वन अग्निकांड के पांच सबसे खराब वर्षों में से चार वर्ष 2020 के बाद से ही हुए हैं। वर्ष 2024 में कम से कम 13.5 मिलियन हेक्टेयर वन जलकर राख हो गए । इसने 2023 में बने पिछले रिकॉर्ड 11.9 मिलियन हेक्टेयर को लगभग 13% से पार कर लिया। कुछ अनुमानों के अनुसार, 2001 से 2024 के बीच आग से होने वाले वृक्ष आवरण के कुल नुकसान का 60% से अधिक हिस्सा बोरियल क्षेत्रों में हुआ। हालांकि आग जंगलों के पारिस्थितिक कामकाज का एक प्राकृतिक हिस्सा है , लेकिन इन क्षेत्रों में आग से होने वाले वृक्ष आवरण के नुकसान में तेजी से वृद्धि हुई है, जो पिछले 24 वर्षों में प्रति वर्ष लगभग 160,100 हेक्टेयर की दर से बढ़ रहा है।
जलवायु परिवर्तन इसका मुख्य कारण है। उत्तरी उच्च अक्षांश क्षेत्र पृथ्वी के बाकी हिस्सों की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहे हैं, जिससे आग लगने का मौसम लंबा हो रहा है , आग लगने की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है , और जंगलों में जले हुए क्षेत्र का आकार बढ़ रहा है ।आग मिट्टी की रासायनिक और जैविक संरचना को बदल देती है। उच्च तापमान से जैविक पदार्थ जलकर नष्ट हो सकते हैं, मिट्टी की उर्वरता कम हो सकती है और यहाँ तक कि मिट्टी जल-विरोधक (पानी सोखने में असमर्थ) भी हो सकती है, जिससे कटाव हो सकता है ।जंगल की आग पर्यावरण, वन्यजीवों और मानव जीवन के लिए विनाशकारी है। यह अमूल्य वनस्पति, जैव-विविधता और कार्बन सिंक को नष्ट करती है, जिससे गंभीर वायु प्रदूषण, मिट्टी का क्षरण और जलवायु परिवर्तन बढ़ता है। यह इंसानी बसावटों, आजीविका और पशुधन को भी भारी आर्थिक नुकसान पहुँचाती है। हालांकि प्राकृतिक वन अग्नि के कुछ लाभ भी है ।
जंगल की आग कभी-कभी एक प्राकृतिक प्रक्रिया होती है, और यह फूलों के खिलने, शाखाओं के विकास और पौधों के अंकुरण को बढ़ावा देकर जंगलों की मदद करती है।
सतह तक सीमित रहने वाली आग जंगलों के प्राकृतिक पुनर्जनन में सहायक हो सकती है। मिट्टी के गर्म होने से लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधि बढ़ सकती है और क्षयकारी प्रक्रियाओं में तेजी आ सकती है जो वनस्पति के लिए उपयोगी होती हैं।
आग कई प्रजातियों के सुप्त बीजों को पुनर्जीवित करने में मदद करती है।
आग लगने के तुरंत बाद उनकी वृद्धि दर अधिक होती है, जब तक कि वे एक निश्चित ऊंचाई तक नहीं पहुंच जाते।
आग लगने से आक्रामक प्रजातियों को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
किंतु वन अग्नि से नुकसान बहुत है भूमि क्षरण के सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से एक है, जिससे जैव विविधता का नुकसान, वनों की कटाई और मरुस्थलीकरण जैसी प्रक्रियाएं होती हैं।
जंगल की आग से क्लोरीन युक्त यौगिक निकलते हैं। इनमें से कुछ ओजोन परत तक पहुंच सकते हैं और प्रकाश उत्प्रेरक द्वारा ओजोन क्षरण का कारण होते हैं।
वन की आग विश्व में डाइऑक्सिन के सबसे बड़े उत्पादक हैं। डाइऑक्सिन जैव-संचयी विष हैं , जो पर्यावरण में लंबे समय तक बने रह सकते हैं। उत्तराखंड में 2025 से 2026 में 63 आग की बड़ी घटनाओं ने 35.91 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुए है जिसमें पंचायत क्षेत्रों की 6.35 हेक्टेयर जंगल शामिल है ।
हिमाचल प्रदेश
- फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) के अनुसार 20 जून 2024 तक पूरे प्रदेश में 2168 आग की घटनाएं दर्ज हुईं।
- इसमें 8.25 करोड़ रुपये की वन संपदा का नुकसान हुआ।
- 25,000.405 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ – 4668.375 हेक्टेयर प्लांटेशन, 18,749.97 हेक्टेयर प्राकृतिक वन और 1582.06 हेक्टेयर अन्य क्षेत्र।
- सबसे ज्यादा नुकसान धर्मशाला फॉरेस्ट सर्कल में: 504 घटनाएं। मंडी 352, हमीरपुर 258, नाहन 255।
- 2024 में अकेले जंगलों में 4096 आग की घटनाएं दर्ज हुईं, जो 2021-2023 से कहीं ज्यादा हैं। d2d2f837
उत्तराखंड
- 2023-24 सीजन में आग की 2816 घटनाएं हुईं, जबकि 2024-25 में 20 मार्च तक 1347 अलर्ट दर्ज हुए।
- 15 जून 2024 तक 1237 घटनाओं में 1691.22 हेक्टेयर वन क्षेत्र जल चुका था।
- नवंबर 2023 से 7 मई 2024 तक 700 हेक्टेयर से ज्यादा जंगल जला।
- 2024 में कुल 1771 हेक्टेयर जंगल आग से प्रभावित हुआ। ef1740bde28e8bb9
जम्मू-कश्मीर और पूरे हिमालयी क्षेत्र
- स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2023 के अनुसार नवंबर 2023-जून 2024 के बीच हिमाचल में आग की घटनाओं में 1339%, जम्मू-कश्मीर में 2822% और उत्तराखंड में 293% का इजाफा हुआ।
- नवंबर 2023 से जून 2024 के बीच देशभर में आग ने 24,34,562.33 वर्ग किमी वन क्षेत्र को चपेट में लिया।
वन भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची का विषय हैं जिसे 42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से इस सूची में शामिल किया गया है)।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय एम ओ ई एफ सी सी की वन अग्नि संबंधी राष्ट्रीय कार्य योजना एन ए पी एफ एफ में शामिल है
केंद्रीय प्रायोजित वन अग्नि निवारण एवं प्रबंधन एफ पी एम योजना के तहत वन अग्नि निवारण एवं प्रबंधन उपाय भी प्रदान करता है।
वन प्रबंधन योजना (एफपीएम) ने 2017 में वन प्रबंधन गहनता योजना (आईएफएमएस) का स्थान लिया। आईएफएमएस में संशोधन करके, एफपीएम ने वन अग्नि नियंत्रण कार्य के लिए समर्पित राशि में वृद्धि की है।
एफपीएम के तहत आवंटित धनराशि केंद्र-राज्य लागत-साझाकरण फार्मूले के अनुसार है, जिसमें पूर्वोत्तर और पश्चिमी हिमालयी क्षेत्रों में केंद्र और राज्य के वित्तपोषण का अनुपात 90:10 है और अन्य सभी राज्यों के लिए यह अनुपात 60:40 है।
यह राज्यों को राष्ट्रीय वनरोपण कार्यक्रम (एनएपी) और हरित भारत मिशन (जीआईएम) के वित्त पोषण के एक हिस्से को वन अग्नि नियंत्रण कार्यों की ओर निर्देशित करने की सुविधा भी प्रदान करता है। जंगल को आग से बचाने के लिए सेटेलाइट की मदद के साथ हॉलीकॉप्टर ,आग बुझने वाली गैस तथा ट्रैंड मानव की जरूरत है जो आग को रोकने में कारगर हो।




















