September 22, 2026
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वन पंचायत प्रतिनिधियों तथा त्रिस्तरीय पंचायत व स्थानीय शहरी निकाय के निर्वाचित सदस्यों को किया संबोधित

प्रतिनिधियों से सीधे संवाद कर उनके अनुभव, चुनौतियों और सुझावों को भी सुना

नैनीताल। सरोवर नगरी में बुधवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सतत विकास एवं पारिस्थितिक संतुलन सुनिश्चित करने के लिए सभी हितधारकों – सरकारी संस्थानों, पंचायती राज संस्थाओं, नगरीय निकायों, वन पंचायतों तथा नागरिकों – की संयुक्त एवं सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाना और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों का सम्मान करना दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता और राष्ट्रीय प्रगति के लिए अत्यंत आवश्यक है। नैनीताल स्थित डॉ. रघुनंदन सिंह टोलिया प्रशासनिक अकादमी में वन पंचायत प्रतिनिधियों तथा त्रिस्तरीय पंचायत व स्थानीय शहरी निकाय के निर्वाचित सदस्यों को संबोधित करते हुए श्री बिरला ने कहा कि उत्तराखंड की वन पंचायतें सामुदायिक भागीदारी आधारित वन प्रबंधन का एक सफल मॉडल बनकर उभरी हैं, जो न केवल वन संरक्षण एवं संवर्धन में योगदान दे रही हैं, बल्कि रोजगार सृजन और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को भी साकार कर रही हैं।
इस दौरान उन्होंने प्रतिनिधियों से सीधे संवाद कर उनके अनुभव, चुनौतियों और सुझावों को भी सुना। वन पंचायतों को “भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे सशक्त कड़ी” बताते हुए श्री बिरला ने कहा कि जमीनी स्तर की संस्थाएं संरक्षण और सुशासन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वन पंचायत से संवाद करना मेरे लिए लोकतंत्र की सबसे सशक्त कड़ी से मिलने जैसा है। उन्होंने कहा कि यहॉं की पंचायतों का अनुभव दिल्ली की पंचायत से कम नहीं है। जल, जंगल और जमीन के पारस्परिक संबंध को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि ये प्राकृतिक संसाधन पारिस्थितिक संतुलन और मानव जीवन के आधार हैं। इनका संरक्षण केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि सामूहिक दायित्व है, जिसके लिए जमीनी स्तर पर सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक एवं पर्यावरणीय विरासत की सराहना करते हुए श्री बिरला ने कहा कि यह राज्य मानव और प्रकृति के सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने स्थानीय समुदायों के अमूल्य योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि जल और वृक्षों के प्रति श्रद्धा जैसी परंपराएं आज भी सतत जीवनशैली का मार्गदर्शन कर रही हैं। राज्य के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक काल में वन संसाधनों के दोहन के विरुद्ध स्थानीय समुदायों ने प्रभावी प्रतिरोध किया। 1930 के दशक से वन संरक्षण, सुरक्षा और अधिकारों के लिए निरंतर कानून एवं नीतिगत प्रयास किए गए हैं। उन्होंने कहा कि इन नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में शेष चुनौतियों का समाधान प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए।
उन्होंने स्थानीय समुदायों की भूमिका पर बल देते हुए कहा कि वन और वन्यजीवों का संरक्षण तभी संभव है जब इनसे जुड़े लोगों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित हो। उन्होंने पंचायती राज संस्थाओं, नगरीय निकायों और वन पंचायतों से आह्वान किया कि वे जनभागीदारी को बढ़ावा दें, पर्यावरण अनुकूल आजीविका के अवसर विकसित करें तथा संतुलित एवं सतत विकास सुनिश्चित करें।
योग और आयुर्वेद की वैश्विक बढ़ती स्वीकार्यता का उल्लेख करते हुए श्री बिरला ने कहा कि उत्तराखंड इन पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों का प्रमुख केंद्र है। उन्होंने वन पंचायतों के सहयोग से औषधीय पौधों के लिए व्यापक कार्ययोजना बनाने, उनके वैल्यू एडिशन, शोध और आधुनिक स्वास्थ्य प्रणाली के साथ एकीकरण पर बल दिया। उन्होंने कहा कि एलोपैथी में व्यापक शोध हुआ है, किंतु औषधीय पौधों और पारंपरिक ज्ञान पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि स्थानीय समुदायों के पास व्यावहारिक और अनुभवजन्य ज्ञान का भंडार है, विशेषकर वनाग्नि जैसी चुनौतियों से निपटने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है, जहां अंतिम व्यक्ति की आवाज भी शासन-प्रशासन तक पहुंचती है और उसे महत्व दिया जाता है। जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौती का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इससे निपटने के लिए जनभागीदारी अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली के संदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि उत्तराखंड का वन पंचायत मॉडल विश्व के लिए उदाहरण बन सकता है। उन्होंने राज्य में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी की सराहना करते हुए कहा कि वन संरक्षण में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। इस अवसर पर कैबिनेट मंत्री रामसिंह कैड़ा, सांसद अजय भट्ट, आयुक्त कुमाऊं व सचिव मुख्यमंत्री दीपक रावत, जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल, अपर प्रमुख वन संरक्षक विवेक पाण्डे द्वारा भी अपने विचार व्यक्त किए।
संवाद कार्यक्रम में विभिन्न वन पंचायतों,त्रिस्तरीय पंचायत,नगर विकास से आए प्रतिनिधियों द्वारा अनेक सुझाव, समस्याओं आदि को रखा गया। माननीय अध्यक्ष ने सभी प्रतिनिधियों के अनुभवों को दिल्ली तक ले जाने का आश्वासन दिया। कहा कि उत्तराखंड ने जंगल बचाने के लिए बलिदान दिए हैं और आज भी यहाँ के लोग प्रकृति संरक्षण के लिए समर्पित हैं।
कार्यक्रम के दौरान प्रतिनिधियों ने वनाग्नि की रोकथाम, वन पंचायतों के सुदृढ़ीकरण, पंचायतों व नगर निकायों को वित्तीय सहायता एवं तकनीकी सहयोग व विभिन्न अधिकार दिए जाने से संबंधित बात रखी व अपने अनुभव एवं समस्याएं साझा कीं। N इससे पूर्व लोकसभा अध्यक्ष श्री बिरला के नैनीताल आगमन पर सांसद नैनीताल उधमसिंह नगर संसदीय क्षेत्र अजय भट्ट, आयुक्त कुमाऊँ मंडल व सचिव माननीय मुख्यमंत्री दीपक रावत,आईजी रिद्धिम अग्रवाल, जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल द्वारा उनका स्वागत किया। इस मौके पर
संवाद कार्यक्रम पर अध्यक्ष जिला पंचायत नैनीताल दीपा दरमवाल,मेयर हल्द्वानी गजराज बिष्ट, काशीपुर दीपक बाली, उत्तराखंड सरकार में डाईत्वधारी शांति मेहरा सहित विभिन्न क्षेत्र प्रमुख, नगर पालिका व नगर पंचायत के अध्यक्ष,पार्षद, सदस्य जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत व ग्राम पंचायत सहित त्रिस्तरीय पंचायत के प्रतिनिधि एवं
अपर प्रमुख वन संरक्षक विवेक कुमार पांडे,मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं तेजस्विनी पाटिल, मुख्य विकास अधिकारी अरविंद कुमार पांडे,नीतीश मणि त्रिपाठी वन संरक्षक,संयुक्त निदेशक एटीआई महेश कुमार,अपर जिलाधिकारी विवेक राय सहित बड़ी संख्या में प्रतिनिधि एवं अधिकारीगण उपस्थित रहे।

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