November 4, 2026
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होली का रंग बनाने में टेशू पलाश के फूल का प्रयोग प्राचीन काल होता आ रहा: प्रोफेसर ललित तिवारी

नैनीताल। सरोवर नगरी होली प्रकृति में ऋतु परिवर्तन का संदेश देकर पर्यावरण की से जोड़ने तथा संरक्षण का संदेश भी देती है। होली का रंग बनाने में टेशू (पलाश के फूल) का प्रयोग प्राचीन काल से ही करते आए है। सांस्कृतिक विरासत की प्राकृतिक होली की परंपरा का निर्वहन टेशू ही करता है । टेशू को ‘जंगल की आग’ भी कहा जाता है। टेशू से
प्राकृतिक रंग बनाया जाता है । टेसू के सूखे फूलों का उपयोग होली में प्राकृतिक रंग (गुलाल) और पानी वाला रंग बनाने में किया जाता है।
टेशू रंग बनाने की परंपरा भगवान कृष्ण और राधा रानी के समय से ब्रज की होली से माना जाता है ।
टेशू के फूलों में प्रचुर मात्रा में सल्फर होता है, जो गर्मियों में त्वचा के संक्रमण और रैशेज के इलाज में मदद करते हैं।
टेशू का फूल सुंदर और रंग-बिरंगा फूल है जो भारत के विभिन्न हिस्सों में पाया जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम बूटियां मनोस्परमा है जो इसका पौधा मध्यम आकार का होता है और इसके फूल चमकीले नारंगी लाल रंग के होते हैं। इसे “फ्लेम ऑफ द फॉरेस्ट” भी कहा जाता है। यह फूल मुख्य रूप से वसंत ऋतु में खिलता है ।पुराणों और प्राचीन भारतीय संस्कृति में अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना गया हैं। इसे अग्नि और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। टेशू को यज्ञोपवीत में भी प्रयुक्त किया जाता है ।पलाश वृक्ष अथवा ‘पलास’, ‘परसा’, ‘ढाक’, ‘ टेशू ‘ नाम से जाने जाना वाला ये भारत के सुंदर फूलों वाले प्रमुख वृक्षों में से एक है। ऋग्वेद में ‘सोम’, ‘अश्वत्‍थ’ तथा ‘पलाश’ वृक्षों की विशेष महिमा वर्णित है। माना जाता है कि पलाश के वृक्ष में सृष्टि के प्रमुख देवता- ब्रह्मा, विष्णु और महेश का निवास है। अत: पलाश का उपयोग ग्रहों की शांति हेतु तथा धार्मिक अनुष्ठानों में प्रयोग किया जाता है। आयुर्वेद में पलाश के पाँचों अंगों- तना, जड़, फल, फूल और बीज से दवाएँ बनाने का जिक्र है ।
परिचय
टेशू का पेड़ मध्यम आकार का, क़रीब 12 से 15 मीटर लंबा होता है। इसका तना सीधा, अनियमित शाखाओं और खुरदुरे तने वाला होता है तथा विकास दर बहुत धीमी होती है। पलाश का वृक्ष भारत और दक्षिण पूर्वी एशिया के बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान, थाईलैंड, कम्बोडिया, मलेशिया, श्रीलंका और पश्चिम इंडोनेशिया में बहुतायत में मिलता है। लेकिन 19वीं शती के प्रारंभ में इनकी तेज़ी से कटाई होने के कारण अब कम मिलता है ।
महाकवि कालिदास ने पलाश के फूलों को वसंत में वन की अग्नि के समान और धरती के लिए लाल साड़ी जैसा बताया है। श्रृंगार रस के साथ प्रचुरता से हुआ है। एक पुराण कथा के अनुसार भगवान शिव और पार्वती का एकांत भंग करने के कारण अग्नि देव को शाप ग्रस्त होकर पृथ्वी पर पलाश के वृक्ष में जन्म लेना पड़ा। आधुनिक काल में रवीन्द्रनाथ त्यागी का वयंग्य संग्रह- ‘पूरब खिले पलाश’, मेहरून्निसा परवेज का उपन्यास ‘अकेला पलाश’, मृदुला बाजपेयी का उपन्यास ‘जाने कितने रंग पलाश के’, नरेन्द्र शर्मा की ‘पलाश वन’, नचिकेता का गीत संग्रह ‘सोये पलाश दहकेंगे’, देवेन्द्र शर्मा इंद्र का दोहा संग्रह ‘आँखों खिले पलाश’ आदि टेसू या पलाश की प्रकृति को आधार मान कर लिखे गए है । शुभ होली

इसे पलाश या ढाक भी कहा जाता है और यह मुख्य रूप से जंगलों और ग्रामीण क्षेत्रों में पाया जाता है। इसके पेड़ का तना मजबूत होता है और पत्ते चौड़े होते हैं।

टेसू के फूल का भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व है
। फूलों को होली के अलावा आयुर्वेदिक में पित्तशामक, कफनाशक और ज्वरनाशक हेतु प्रयोग किया जाता है ।

टेसू के फूल से निकाला गया रंग शरीर को ठंडक प्रदान करता है इसकी छाल और पत्तों का उपयोग भी विभिन्न रोगों के उपचार में किया जाता है। पलाश का वृक्ष न सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य को बढ़ाता है
टेशू के फूल
प्राकृतिक रंग
ज्वरनाशक ,
त्वचा रोगों में लाभदायक ,
पाचन सुधार ,तथा इसका तेल
बालों की मजबूती के लिए किया जाता है। इसमें
एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं जो शरीर को डिटॉक्स करने में सहायक होते हैं।

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