डीएसबी परिसर में दो दिवसीय सांख्यिकीय प्रशिक्षण कार्यशाला का हुआ समापन
प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र भी वितरित किए गए




नैनीताल। सरोवर नगरी में कुमाऊँ विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर स्थित समाजशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित दो
दिवसीय सांख्यिकीय प्रशिक्षण कार्यशाला के दूसरेएवंअंतिम दिन का मुख्य विषय अनुमानात्मक सांख्यिकी तथा जेमोवी के
माध्यम सेइसके व्यावहारिक अनुप्रयोग पर केंद्रित रहा। दिनभर के सत्रों मेंटी-टेस्ट, एनोवा, चयनित अप्राचलिक परीक्षण
तथा प्रतिगमन विश्लेषण पर सैद्धांतिक चर्चाकेसाथ व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया।
प्रथम सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. वीरेंद्र प्रताप यादव नेअनुमानात्मक सांख्यिकी की आधारभूत अवधारणाओं से
प्रतिभागियों को परिचित कराया। उन्होंनेशोध मेंआगमनात्मक एवं निगमनात्मक दृष्टिकोणों की व्याख्या करतेहुए कहा कि
किसी भी सांख्यिकीय तकनीक के प्रयोग सेपहलेशोध की तार्किक आधारभूमि को समझना आवश्यक है। उन्होंनेउपयुक्त
नमूना चयन के महत्व पर भी प्रकाश डाला और बताया कि समग्र जनसंख्या के संबंध मेंनिकालेगए निष्कर्षकाफी हद तक
उस नमूने की गुणवत्ता एवंउपयुक्तता पर निर्भर करतेहैं, जिस पर विश्लेषण आधारित होता है।
इसके बाद दूसरेसत्र मेंइग्नू, नई दिल्ली सेआए डॉ. अश्विनी कु मार नेसांख्यिकीय परीक्षणों के चयन के पीछेनिहित तर्क
तथा विशेष रूप सेसार्थकता स्तर और क्रांतिक मान के बीच संबंध को स्पष्ट किया। उन्होंनेशोध विधि एवंशोध अभिकल्प
के बीच अंतर समझातेहुए एनोवा को तीन या अधिक समूहों के माध्यों की तुलना केलिए उपयोगी तकनीक के रूप मेंप्रस्तुत
किया। इसके साथ ही चरों के बीच संबंधों को समझनेके लिए सहसंबंध तथा एक चर के आधार पर दूसरेके पूर्वानुमान से
संबंधित प्रतिगमन की भी चर्चाकी गई।
व्यावहारिक प्रशिक्षण को प्रभावी बनानेके लिए प्रतिभागियों के बीच “शैक्षणिक प्रदर्शन सेसंबंधित कारक” विषय पर एक
प्रश्नावली वितरित की गई। इससेप्राप्त आँ कड़ों का उपयोग आगेके व्यावहारिक सत्र मेंकिया गया। डॉ. अश्विनी कु मार ने
जेमोवी के माध्यम सेविभिन्न प्रकार के टी-टेस्ट के प्रयोग का प्रदर्शन किया तथा विश्लेषण सेपूर्वआवश्यक मान्यताओं की
जानकारी दी। इसके बाद एक-मार्गी एनोवा तथा पश्च-परीक्षण का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया, जिसके माध्यम से
विभिन्न समूहों के बीच महत्वपूर्णअंतरों की पहचान करना समझाया गया। जहाँप्राचलिक परीक्षणों की आवश्यक शर्तेंपूरी
नहीं होती हैं, वहाँउपयोगी चयनित अप्राचलिक परीक्षणों सेभी प्रतिभागियों को परिचित कराया गया।
अंतिम तकनीकी सत्र मेंप्रतिगमन विश्लेषण पर केंद्रित प्रशिक्षण दिया गया। इसमेंप्रतिगमन समीकरण, गुणांकों तथा उनकी
व्याख्या सेसंबंधित अवधारणाओं को समझानेके साथ व्यावहारिक अभ्यास भी कराया गया। इन सत्रों के माध्यम से
प्रतिभागियों को सांख्यिकीय अवधारणाओं को अपनेशोध कार्यमेंलागूकरनेका अवसर मिला।
कार्यशाला का समापन समारोह कार्यकारी निदेशक डी एस बी तथा विजिटिंग प्रोफे सर्स निदेशालय के निदेशक प्रो. ललित तिवारी की
अध्यक्षता मेंआयोजित किया गया। अपने संबोधन में उन्होंने प्रतिभागियों से कार्यशाला के दौरान अर्जित ज्ञान एवं कौशल
को अपनेशोध कार्यमेंनिरंतर प्रयोग करनेतथा अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप शोध की गुणवत्ता बनाए रखनेका आह्वान
किया।
कार्यक्रम समन्वयक प्रो. दीपक पालीवाल नेप्रतिभागियों को उनके उज्ज्वल शोध भविष्य के लिए शुभकामनाएँदेतेहुए कहा
कि शोधकर्ताओं को के वल प्रचलित सांख्यिकीय प्रक्रियाओं को लागूकरनेके बजाय शोध की अंतर्निहित प्रक्रियाओं एवं
सिद्धांतों को समझनेपर ध्यान देना चाहिए। कार्यक्रम समन्वयक डॉ. सरोज पालीवाल नेप्रतिभागियों की सक्रिय सहभागिता
तथा दोनों प्रशिक्षकों केसमर्पित योगदान केलिए आभार व्यक्त किया।
कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किए गए। इस मौके पर समापन समारोह में प्रो. ज्योति जोशी, प्रो. अर्चना
श्रीवास्तव, प्रो. प्रियंका नीरज रुवाली, प्रो. एमसी जोशी, डॉ. ममता लोहमी जोशी, डॉ. पूजा पालीवाल, देवेश, सूरज, नीरज आदि शामिल रहे।

























