जोनाकी रे की कविताएँ
बिछड़ने की टीस और अपने अतीत को वर्तमान से जोड़ने की गहरी चाह को बयान करती


नैनीताल। सरोवर नगरी में विश्वकवि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के 165वें जन्मदिन के अवसर पर कुमाऊँ विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ द्वारा अंग्रेजी विभाग, डीएसबी परिसर, नैनीताल के व्याख्यान कक्ष में अंग्रेजी कवयित्री, लेखिका और संपादक जोनाकी रे का एकल कविता-पाठ और विद्यार्थियों से संवाद आयोजित किया गया। उन्होंने अपने कविता संग्रह ‘फायरफ्लाई मेमोरीज’ से बिलांगिंग, द सीक्रेट टू ए गुड बिरयानी, इटिंग वाटर एण्ड लिविंग टेल्स, ए रूम आफ हर ओन, बर्न तथा फायरफ्लाई कविताओं का पाठ किया।
जोनाकी रे की कविताएँ बिछड़ने की टीस और अपने अतीत को वर्तमान से जोड़ने की गहरी चाह को बयान करती हैं। ‘फायरफ्लाई मेमोरीज’ का पहला खंड सीधे प्रवासी अनुभव को छूता है। अपनी मिट्टी छोड़कर नई ज़िंदगी बसाने के साथ आने वाली बेचैनी और तड़प को समेटता है। सजीव बिंबों के ज़रिए रे ने प्रवास की जटिलताओं को सरल, मार्मिक पलों में पिरो दिया है। इस खंड की हर कविता विस्थापन और तालमेल की बढ़ती दास्तान में एक कड़ी जोड़ती है।
दूसरे खंड की कविताएँ अपना ध्यान उन कम विशेषाधिकार प्राप्त प्रवासियों की कहानियों पर ले जाती हैं, जो अवसर के लिए नहीं, बल्कि मजबूरी में अपना घर छोड़ते हैं। ये वे मजदूर हैं जो चेहराविहीन और अदृश्य बने रहते हैं। विदेशी धरती पर बिना पहचान या अधिकारों के श्रम करते हैं। रे की पैनी नज़र और संवेदनशील आवाज़ इन उपेक्षित लोगों के जीवन पर ध्यान खींचती है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर और अमेरिका की इलिनोइस यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त जोनाकी रे ने बताया कि संग्रह का तीसरा भाग राजनीतिक तेवर लिए हुए है। यह जाति और सांप्रदायिक हिंसा, ऑनर किलिंग, औरतों के ख़िलाफ़ हिंसा के सामान्यीकरण जैसे समकालीन मुद्दों को उठाता है। तेज़ाब हमलों की परेशान करने वाली आवृत्ति भी इसमें शामिल है।
‘फायरफ्लाई मेमोरीज़’ का चौथा खंड “घर” के विचार पर चिंतन करता है, ख़ास तौर पर उस घर वापसी पर जिसे हम में से कई लोग अधेड़ उम्र तक पहुँचते-पहुँचते अनुभव करते हैं। इन कविताओं में घर सिर्फ़ एक भौतिक जगह नहीं है, बल्कि जीवन के अनिवार्य बदलावों से बना एक बदलता हुआ विचार है। अतीत और वर्तमान दोनों में बूढ़े होते माता-पिता, प्रियजनों का खोना, बचपन की जगहों का बदल जाना और स्त्रीत्व का बदलता अनुभव। यह खंड नॉस्टैल्जिया से भरा है लेकिन इन बदलावों का सामना करने के लिए ज़रूरी ताक़त को भी उजागर करता है। रे स्मृति, उम्र बढ़ने और हानि के विषयों को स्त्रीत्व के नज़रिए से देखती हैं, ताकि घर लौटने की भावनात्मक जटिलता को शाब्दिक और लाक्षणिक दोनों रूपों में पकड़ सकें।
अपने स्वागत संबोधन में महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक शिरीष कुमार मौर्य ने कहा कि जोनाकी रे का पहला कविता संग्रह ‘फायरफ्लाई मेमोरीज़’ अतीत की पड़ताल करता है और अपने सीमांत काव्य-क्षेत्र में प्रचंड स्मृतियों का मार्गचित्र बनाता है। साथ ही गर्माहट और तनाव, ईमानदारी और तात्कालिकता को एक सम्मोहक शक्ति के साथ सामने लाता है। वे सचमुच कविता के बाहरी तत्वों को जला देती हैं और परिचित को नए में बदलने के लिए लिखती हैं, जो किसी भी कवि के लिए एक महत्वपूर्ण कौशल है।
कविताओं के इस प्रभावशाली संग्रह में वैज्ञानिक-कवि हमें जीवन के महत्वपूर्ण क्षण देती हैं, जो उनकी बंगाली जड़ों और वैज्ञानिक विरासत से उपजे सांस्कृतिक प्रभावों की एक श्रृंखला से सामंजस्य बिठाते हैं। वे जीवन को देखने का एक दिलचस्प तरीका अपनाती हैं जिससे वे गहराई से जुड़ी हैं और कविता को कैसा होना चाहिए, इस रूढ़िवादिता को अपनाने से इनकार करती हैं।
कार्यक्रम का संचालन अंग्रेजी विभाग, डीएसबी परिसर की वरिष्ठ प्राध्यापक प्रो. हरिप्रिया पाठक तथा धन्यवाद महादेवी वर्मा सृजन पीठ के समन्वयक मोहन सिंह रावत ने व्यक्त किया।
आइसलैंड राइटर्स रिट्रीट एलुमनी अवार्ड से सम्मानित कवयित्री जोनाकी रे के साथ नकुल बिष्ट, ईश्वर सिंह धामी, गुंजिता पंत, धनंजय पाठक, हिमांशु महरा, गौरव पाण्डे आदि विद्यार्थियों ने मौजूदा दौर में लेखन की प्रासंगिकता और वर्तमान समय की चिंताओं पर समसामयिक संवाद में प्रतिभाग किया।
इस अवसर पर हिंदी विभाग की वरिष्ठ प्राध्यापक प्रो. चन्द्रकला रावत, प्रो. प्रीति आर्या सहित डाॅ. शशि पाण्डे, डाॅ. दीक्षा मेहरा, डाॅ. कंचन आर्या, डाॅ. मथुरा इमलाल, मेधा नैलवाल, शिवानी शर्मा, हिमांशु विश्वकर्मा, रोहित सिंह रौतेला आदि उपस्थित थे।





















