October 3, 2026
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जापान : ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य विषय पर विस्तार व्याख्यान

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भारत-जापान संबंधों के 1500 वर्ष” विषय पर एक विस्तार व्याख्यान का किया आयोजन

नैनीताल। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग द्वारा आज “जापान : उसका ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य तथा भारत-जापान संबंधों के 1500 वर्ष” विषय पर एक विस्तार व्याख्यान का आयोजन किया गया। यह व्याख्यान हावर्ड एवं कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से जुड़े प्रख्यात विद्वान, लेखक एवं शोधकर्ता प्रो. पवन कमलेश ने प्रस्तुत किया। अपने व्याख्यान में प्रो. पवन कमलेश ने बताया कि जापान चार हज़ार किलोमीटर लंबा द्वीप समूह है, जिसकी चौड़ाई अधिकतम 300 किलोमीटर है। जापान की राजधानी टोक्यो विश्व का सबसे बड़ा नगर है, जहाँ लगभग 3.5 करोड़ लोग निवास करते हैं, फिर भी यह नगर अपनी स्वच्छता, सुरक्षा और सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है।
इतिहास पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जापानी लोगों को यामातो कहा जाता है, जिनमें कोरिया और जापान के मूल निवासियों का मिश्रण है। भारत को जापानी भाषा में तेनज्युकु कहा गया है, जिसका अर्थ है “देवों का देश”, जबकि जापान का प्राचीन नाम निहोन रहा है। जापानी सभ्यता पर भारतीय संस्कृति का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। जापानी काना लिपि में संस्कृत एवं देवनागरी की छाप है, यहाँ तक कि उनकी अंक पद्धति में भी भारतीय प्रभाव परिलक्षित होता है। सातवीं शताब्दी में भारत के भिक्षु बोधिसेन रेशम मार्ग से जापान गए और वहाँ बौद्ध धर्म एवं भारतीय संस्कृति के गहरे बीज रोपे। जापान के अनेक मंदिर भारतीय स्थापत्य एवं विहार परंपरा से प्रभावित हैं। उदाहरण स्वरूप नारा शहर का तोदाइजी मंदिर, जहाँ सारनाथ के हिरण उद्यान की झलक देखने को मिलती है।
प्रो. कमलेश ने आगे कहा कि जापानी समाज आधुनिक होते हुए भी अपनी परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। वहाँ वृद्धजनों को विशेष सम्मान प्राप्त है। सन् 1872 तक जापान में अधिकांश लोग शाकाहारी रहे और केवल सीमित लोग ही समुद्री भोजन का सेवन करते थे। उन्होंने यह भी बताया कि जापान में गाय को गहरी श्रद्धा प्राप्त है। जापानी संस्कृति में लक्ष्मी, गणेश, कूबेर और बुद्ध जैसे अनेक हिन्दू देवताओं का पूजन होता है। विवाह अथवा अन्य अवसरों पर धन को लिफाफे में देने की परंपरा है, क्योंकि यह माना जाता है कि धन को सीधे हाथ में देना अनुचित है और यह व्यक्ति को भ्रष्ट कर सकता है।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि भारत और जापान के बीच धार्मिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक संबंध अत्यंत प्राचीन और गहरे रहे हैं, और आज भी दोनों देशों के बीच संबंध निरंतर प्रगाढ़ होते जा रहे हैं।
इस अवसर पर विभागाध्यक्ष प्रो. संजय घिल्डियाल ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि यह व्याख्यान विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हुआ। इससे न केवल जापानी समाज और संस्कृति की गहरी समझ विकसित हुई, बल्कि भारत-जापान संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी स्पष्ट हुई। प्रो संजय घिल्डियाल ने बताया कि विभाग में इस तरह के व्याख्यानों शुरुआत की जा रही है और भविष्य में इस तरह के अन्य अकादमिक कार्यक्रम भी विभाग द्वारा आयोजित किए जाएंगे। इस अवसर पर प्रो. सवित्री कैड़ा जंतवाल, प्रो. संजय टम्टा, प्रो. ज्योति जोशी, प्रो. आशीष मेहता, डॉ. रीतेश साह, डॉ. गगनदीप होती, डॉ अशोक कुमार, डॉ मनोज बाफ़िला, डॉ. दीपिका पंत, डॉ. हृदेश शर्मा सहित विभाग के अनेक प्राध्यापक उपस्थित रहे।
विभाग से डॉ. पूरन अधिकारी, डॉ. भुवन शर्मा, डॉ. हरदयाल, डॉ. वीरेंद्र, डॉ शिवराज कपकोटी तथा शोधार्थियों में अनन्या जोशी, आकाशा जोशी, नीरज बिष्ट, रोहित भाकुनी, ऋषभ रावल, किशोर जोशी, पूनम गोस्वामी, दीपक कुमार, माला, सपना महर, सीमा का इस कार्यक्रम के आयोजन में विशेष योगदान रहा। साथ ही इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शोधार्थी व विद्यार्थी भी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का संयोजन डॉ. शिवानी रावत द्वारा किया गया।

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