पद्मश्री प्रो. शेखर पाठक पर्यावरणीय आंदोलनों के इतिहास को समझने हेतु स्थानीय आखयानों व मौखिक परंपराओं पर व्याखयान दिए

नैनीताल । सरोवर नगरी में कुमाऊँ विश्वविद्यालय नैनीताल के यूजीसी मालवीय मिशन टीचर ट्रेनिंग सेंटर द्वारा आयोजित इतिहास में समकालीन प्रवृतियाँ और उभरते परिप्रेक्ष्य विषयक रिफ्रेशर कोर्स में देश के विभिन्न राज्यों से आए गुरुजनों को इतिहास लेखन की नवीन पद्धतियों, स्रोतों और समकालीन ऐतिहासिक विमर्श से परिचित कराया जा रहा है।
इसी के तहत बुधवार को प्रसिद्ध इतिहासकार एवं पर्यावरण इतिहास के अध्येता पद्मश्री प्रो. शेखर पाठक ने ऐतिहासिक स्रोत के रूप में मौखिक परंपराएँ एवं व्यक्तिगत आखयान, सांस्कृतिक विरासत एवं स्थानीय इतिहास तथा पारिस्थितिक इतिहास, संरक्षण एवं भारत में पर्यावरणीय आंदोलन विषयों पर विस्तृत व्याखयान दिए।प्रो. पाठक ने कहा कि इतिहास केवल लिखित दस्तावेजों तक सीमित नहीं है। मौखिक परंपराएँ, व्यक्तिगत अनुभव, स्थानीय स्मृतियाँ, लोक आखयान और समुदायों की सामूहिक स्मृति इतिहास को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। विशेषकर स्थानीय और पर्यावरणीय इतिहास के अध्ययन में इन स्रोतों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने प्रतिभागियों को स्थानीय इतिहास को व्यापक राष्ट्रीय और वैश्विक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से जोडक़र देखने का आह्वान किया।
पर्यावरणीय आंदोलनों के ऐतिहासिक विकास पर चर्चा करते हुए प्रो. पाठक ने भारत में वन, जल, भूमि और पर्वतीय पारिस्थितिकी के संरक्षण से जुड़े जनआंदोलनों को सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों के साथ जोडक़र समझाया। उन्होंने औपनिवेशिक काल और देशी रियासतों में हुए वन एवं जन प्रतिरोधों से लेकर आधुनिक पर्यावरण आंदोलनों तक की ऐतिहासिक यात्रा पर प्रकाश डाला। उत्तराखंड के संदर्भ में उन्होंने २००७ के नदी बचाओ आंदोलनों, झारखंड के सिंहभूम वन आंदोलन (१९७८) तथा देश के अन्य हिस्सों में जंगल और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए हुए जनप्रतिरोधों को स्थानीय समुदायों के अनुभवों के माध्यम से समझाया। उन्होंने भोपाल गैस त्रासदी के बाद हुए जनआंदोलन तथा औद्योगिक विकास और पर्यावरणीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर प्रश्नों पर भी चर्चा की। बता दें रिफ्रेशर कोर्स में १५ राज्यों के ४९ सहायक प्राध्यापक प्रतिभागी के रूप में शामिल हैं।

























