November 7, 2026
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‘हरेला’ ‘हरियाली’ तथा प्रकृति के हरित रूप के आगमन का दर्शन है : प्रोफेसर ललित तिवारी

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नैनीताल। हरेला’ प्रकृति और पर्यावरण को समर्पित एक अनूठा उत्तराखंड का लोक पर्व है जो प्रकृति के प्रति हमारी निष्ठा ,समर्पण और हरियाली एवं सामाजिक समरसता की सांस्कृतिक विरासत है । ‘हरेला’ ‘हरियाली’ तथा प्रकृति के हरित रूप के आगमन का दर्शन है तथा मानसून की शुरुआत और कृषि के महत्व के साथ लोगों को प्रकृति तथा पर्यावरण से जोड़ कर संरक्षण को तथा सतत विकास हेतु प्रेरित करता है।हरेला “हरे रंग का दिन” या हरियाली का प्रतीक है
। यह त्योहार अच्छी फसल, पर्यावरण संरक्षण, और पारिवारिक सुख-समृद्धि की कामना के लिए मनाया जाता है । हरेला पर्व वैसे तो वर्ष में तीन बार आता है। पहला चैत्र माह में जो प्रथम दिन बोया जाता है तथा नवमी को काटा जाता है। दूसरा श्रावण माह में – सावन लगने से नौ दिन पहले आषाढ़ में बोया जाता है और दस दिन बाद श्रावण के प्रथम दिन काटा जाता है तथा तीसरा
आश्विन माह में नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है और दशहरा के दिन काटा जाता है।
चैत्र का गर्मी के आगमन ,सावन का बरसात के आगमन तथा व आश्विन माह सर्दी के आगमन के साथ हरेला मौसम के बदलाव के सूचक भी है।
किंतु श्रावण माह में मनाये जाने वाला हरेला सामाजिक रूप से अपना विशेष महत्व रखता है ।
। हरेला पौधारोपण अभियान , खेतों, बगीचों और जंगलों में नए पेड़ लगाने ,मिट्टी का कटाव रोकने ,जल संरक्षण , भूमिगत जल के स्तर को बढ़ाने में मदद करता है ।जलवायु परिवर्तन के लिए हरेला कहता है कि यदि प्रकृति स्वस्थ है, तो मानव जीवन भी स्वस्थ है ।
पेड़ हवा से कार्बन डाइऑक्साइड को सोख कर ग्लोबल वार्मिंग को कम करने का काम करता है । हरेला सतत विकास के क्रम में आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और हरा-भरा पर्यावरण बनाने का संकल्प है
सावन में हरेले की शुरुआत से 9 दिन पहले 5 या 7 प्रकार के अनाज (जौ, गेंहू, मक्का, उड़द , गहत ,भट्ट , धान ,सरसों , जौ आदि) बोए जाते हैं तथा सावन के पहले दिन हरेला काटकर घर-घर में पूजा होती है और बुजुर्ग बच्चों के सिर पर रखकर आशीर्वाद देते है ।पौराणिक मान्यता है कि पार्वती का विवाह सावन के पहले दिन ही भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था । प्राचीन कथा के अनुसार, बहुत समय पहले भयंकर सूखा पड़ा , लोगों ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने बारिश की तथा शिवजी के इसी आशीर्वाद को हरेला (हरियाली) के रूप में पूजा जाता है लोकपर्व में लोग अपने हाथों से भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की मिट्टी की मूर्तियाँ जिन्हें डीकारे कहा जाता से अच्छी फसल और मौसम के लिए प्रार्थना करते है । कृषि और पर्यावरण का उत्सव के रूप में लोग पौधे लगाते हैं ताकि धरती हरी-भरी रहे ।हरेला काटने के बाद कुल देवता को अर्पित किया जाता है。 फिर बड़ों द्वारा छोटों के सिर पर हरेला रखकर ‘जीया जागया’ (दीर्घायु और स्वस्थ रहने) का आशीर्वाद दिया जाता है ।
पर्यावरण महत्व का हरेला पर्व पर्यावरण को समर्पण तथा हिमालयी संस्कृति की सकारात्मक को दर्शाता है । इसी लिए
जी रया, जागि रया! (जीते रहो, जागरूक रहो!)दुबक जस जड़ हैजो, पात जस पौल हैजो! (दूब घास जैसी गहरी जड़ें हों, और पत्तों जैसे फैलो!)स्यालक जस वन त्राण हैजो! (सियार/शेर जैसी ताकत हो!)हिमालय में ह्यूं छन तक, गंगा में पानी छन तक, हरेला त्यार माने रया! (जब तक हिमालय में बर्फ है, गंगा में पानी है, तब तक हरेला मनाते रहो।

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