October 1, 2026
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ट्रू वैल्यू अकाउंटिंग को धरातल पर उतारते हुए

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आईआईएफएसआर वैज्ञानिकों ने यूएनईपी टीईईबी एग्रीफूड परियोजना के अंतर्गत

हरिद्वार के किसानों को जलवायु-अनुकूल ढैंचा बीजों से सशक्त बनाया*

हरिद्वार नैनीताल। सतत एवं जैविक कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान (आईआईएफएसआर), मोदीपुरम के वैज्ञानिकों द्वारा आज हरिद्वार जनपद के रुड़की क्षेत्र में, जो यूएनईपी टीईईबी एग्रीफूड परियोजना के प्रमुख अध्ययन क्षेत्रों में से एक है, ढैंचा बीज वितरण अभियान आयोजित किया गया।
इस पहल का मुख्य उद्देश्य किसानों को हरित खाद आधारित पर्यावरण-अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रेरित करना था। अभियान के अंतर्गत किसानों को ढैंचा बीज वितरित किए गए, जिससे प्राकृतिक रूप से मृदा की उर्वरता बढ़ाने तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में सहायता मिलेगी। यह पहल संतुलित उर्वरक उपयोग के मिशन को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जो किसानों को मृदा स्वास्थ्य सुधारने, फसल उत्पादकता बढ़ाने तथा पर्यावरण संरक्षण में योगदान देने के लिए सशक्त बनाती है।

कार्यक्रम में 50 किसानों ने सक्रिय भागीदारी की तथा लगभग 800 किलोग्राम उच्च गुणवत्ता वाले ढैंचा बीज वितरित किए गए। यह वितरण अभियान किसानों को जैविक खेती के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने के साथ-साथ दीर्घकालिक रूप से पुनर्योजी कृषि (रेजेनरेटिव एग्रीकल्चर) के प्रति जागरूक एवं सक्षम बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित होगा।

आईआईएफएसआर के वैज्ञानिकों ने बताया कि ढैंचा एक तीव्र गति से बढ़ने वाली दलहनी फसल है, जो भूमि में नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर प्राकृतिक उर्वरक के रूप में कार्य करती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, “यह अभियान ऐसी जैविक एवं किफायती कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, जो जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के प्रति अधिक सहनशील होने के साथ-साथ जैव विविधता संरक्षण में भी सहायक हैं।”

कृषि एवं खाद्य प्रणालियों में पारिस्थितिकी तंत्र एवं जैव विविधता के आर्थिक महत्व पर केंद्रित यूएनईपी टीईईबी एग्रीफूड परियोजना अध्ययन जिलों में इस प्रकार के नवाचारपूर्ण हस्तक्षेपों के माध्यम से भारतीय कृषि के लिए एक हरित एवं सतत भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर रही है।

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