November 4, 2026
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मां नंदा सुनंदा की मूर्ति का :आधार है कदली

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नैनीताल। उत्तराखंड की आराध्य राजराजेश्वरी हिमालयी संस्कृति को जोड़ने वाली मां नंदा सुनंदा की मूर्ति का आधार कदली है । कदली जिसे बनाना , प्लेंटेन भी कहते है तथा इसका वानस्पतिक नाम मुजा पैराडाइसिएका कुल म्यूजेसियाई है । यह एक बार फल देता है ।भारतीय संस्कृति को एक सूत्र में जोड़ने वाले कदली को पवित्र ,पूजनीय , दिव्य,धार्मिक एवं आध्यात्मिक मन गया है जिसमें भगवान विष्णु ,गुरुदेव बृहस्पति के साथ लक्ष्मी का वास माना जाता है । कदली के जड़ में शिव का तथा मूल में विष्णु विराजते है। इसके पत्तों से पवित्र आसन , पात्र ,तथा शुद्धता से भोजन पात्र भी है ।केले के पेड में लकड़ी नहीं होती जो अहंकार माया के त्याग का प्रतीक है , यह वंश वृद्धि एवं निरंतरता की प्रेरणा देता है । आयुर्वेद में औषधि ,ऊर्जा देने वाला ,पचने में आसान के साथ पारिस्थिकी में गलन शील है। केले को भानुफल ,गज वसा ,कुंजरसत , मोचा ,रंभ भी कहते है जिसमें कैल्शियम ,मैग्नीशियम , आयरन,फॉस्फोरस , कॉपर ,फाइबर ,के साथ एंटी आक्सीडेंट भी मिलते है ।यह पारिस्थितिक अनुकूल है। कदली वन हनुमान आराधना के लिए शुभ माना गया है । महर्षि दुर्वासा ने कदली की उत्पत्ति राख से की तथा इसका हर भाग लाभप्रद है । संपन्नता ,अच्छे स्वास्थ्य के प्रतीक केले की उत्पत्ति 10 हजार वर्ष पूर्व मानी जाती है । साउथ ईस्ट एशिया से पैदा हुए यह सबसे ज्यादा भारत फिर चीन फिर इंडोनेशिया में होता है । कदली बड़े पत्तों के कारण कार्बन सिंक , कार्बन शोषण का कार्य करता है ,मृदा अपरदन को रोकता ,बायोमास के साथ खाद निर्माण ,जल संचय ,वाटर टेबल में सुधार , परागण,आश्रय के साथ फाइटरिमीडिएशन भी करता है। केला भोजन भी है तथा न्यूट्रिशियस भी । पारिस्थितिक अनुकूलन के कारण इसी काफली तने पर मां नंदा सुनंदा की मूर्ति का निर्माण किया जाता है जो प्रकृति के साथ अध्यात्म ,शक्ति एवं परंपरा को प्रदर्शित करता है ।

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