September 26, 2026
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निजी स्कूलों की ‘शिक्षा दलाली’ के खिलाफ लोगों ने उठाई आवाज उठी

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एडीएम उपाध्याय को ज्ञापन देकर चेताया

रुद्रपुर नैनीताल। उत्तराखंड निजी स्कूलों और शैक्षिक संस्थाओं द्वारा शिक्षा का व्यापार और भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है, इस सच्चाई को रुद्रपुर और ऊधम सिंह नगर जिले के अभिभावकों, शिक्षकों, श्रमिक संगठनों व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आज उपजिला अधिकारी पंकज उपाध्याय के समक्ष ज्ञापन देकर स्पष्ट कर दिया। सुब्रत कुमार विश्वास के नेतृत्व में दिए गए इस ज्ञापन में मांग की गई कि शिक्षा को मानवाधिकार और सामाजिक लाभ के बजाय लाभ‑खोर व्यवसाय की तरह न चलाया जाए, वरना जिला मुख्यालय के बाहर धरना‑प्रदर्शन की चेतावनी भी साफ रूप से दी गई।
आंदोलनकारी समूह का आरोप है कि रुद्रपुर और पूरे उत्तराखंड, बल्कि पूरे भारतवर्ष में निजी स्कूल व शिक्षण संस्थाएँ लगातार अपनी फीसें, यूनिफॉर्म और किताबों के नाम पर अत्यधिक राशि वसूल रही हैं, जबकि प्रशासन इस ओर अधिकतर मूक‑दर्शक बना हुआ है। कई अभिभावकों का कहना है कि एक ओर शिक्षा ‘सस्ती और गुणवत्तापूर्ण’ की बात होती है, तो दूसरी ओर निजी स्कूल प्रबंधन फीस, ड्रेस, बस और अन्य अतिरिक्त शुल्कों के नाम पर इतनी रकम ठोंस देता है कि छोटे व मध्यम वर्ग के परिवारों की पढ़ाई पर बहुत भारी आर्थिक बोझ पड़ता है।
ज्ञापन में जोर देकर कहा गया कि निजी स्कूलों की फीस वसूली पर कोई वास्तविक और पारदर्शी नियंत्रण नहीं है, जिसके कारण प्रत्येक वर्ष अचानक फीस बढ़ोतरी, अनावश्यक लेवी और लोकप्रिय “डोनेशन” जैसे नामकरण के तहत अतिरिक्त भुगतान की प्रथा बढ़ती जा रही है। उत्तराखंड सरकार की ओर से पहले भी निजी स्कूलों की फीस वसूली पर नियंत्रण के लिए समिति और प्राधिकरण बनाने की बातें हुई हैं, लेकिन रुद्रपुर जैसे शहरी–क्षेत्रों में अभी भी अधिकांश अभिभावकों का अनुभव यही रहा है कि ये नियम कागज़ तक सीमित रह जाते हैं, वास्तविक कार्यान्वयन नहीं होता।
ज्ञापन देने वालों ने उपजिला अधिकारी को यह भी अवगत कराया कि बिना शिक्षा विभाग की अनुमति या मान्यता के चल रहे कुछ निजी संस्थान भी छात्रों को भर्ती कर रहे हैं, जो उनके भविष्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा करता है। ऐसे “अनधिकृत” स्कूल न तो पाठ्यक्रम के मानकों का पालन करते हैं और न ही छात्रों के लिए कोई जवाबदेही अपनाते हैं। इससे पहले भी उत्तराखंड के अन्य जिलों में बिना मान्यता के संचालित निजी स्कूलों पर कार्रवाई व बंदी की रिपोर्टिंग हो चुकी है, जो यह बताती है कि रुद्रपुर भी इस तरह की अनियमितता से अछूता नहीं है।

समाजसेवी और श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने उपजिला अधिकारी के समक्ष इस बात पर भी ज़ोर दिया कि स्कूलों के अंदर भी एक तरह की “किताबों व ड्रेस की दलाली” चल रही है, जहाँ छात्रों को केवल एक ही दुकान या संस्था से किताब और यूनिफॉर्म खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है, जिससे अनावश्यक महँगाई और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। इस संदर्भ में यह भी याद दिलाया गया कि उत्तराखंड सरकार ने हाल के वर्षों में निजी स्कूलों की फीस और किताबों‑कॉपी की दरों पर नियंत्रण के लिए नीतियाँ व समिति बनाने की घोषणा की है, लेकिन ज़मीन पर उनका असर अभी भी बहुत सीमित है। �
सुब्रत कुमार विश्वास ने ज्ञापन के माध्यम से साफ‑साफ कहा कि अगर कुछ दिनों के भीतर उपजिला स्तर पर ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो उनका समूह जिला मुख्यालय के गेट पर धरना‑प्रदर्शन करने के लिए मजबूर होगा और निजी स्कूलों के लाभ–उद्देश्य वाले शिक्षा‑व्यापार को बंद करने की मांग को और ज़्यादा तीव्रता से उठाएगा। इस आंदोलन के समर्थन में इंकलाबी मजदूर केंद्र, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के युवा‑नेता, छात्र नेता और कई समाजसेवी व्यक्ति आज ज्ञापन‑प्रस्तुति के समय मौजूद रहे, जिनमें दिनेश भट्ट, श्रीवास सरकार, मनीष गुप्ता, रजनीश गंगवार, दीपमाला जी, तपेश्वर चौहान, लालमोहन जोशो, संजय गंगवार, तापस बिस्वास, उत्तम दास, धीरज कुमार, गौतम मादक, गोपी सरकार, उत्तम कुमार, राजेश मंडल, दिनेश गंगवार और राजेश चौधरी जैसे नाम शामिल थे।
अभिभावकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि शिक्षा तभी लोकतांत्रिक और समावेशी बन सकती है जब फीस, किताबें और यूनिफॉर्म जैसी बातों पर किसी एक दलाल‑वर्ग या निजी संस्था का एकाधिकार नहीं रहेगा। वे चाहते हैं कि रुद्रपुर जिला, उत्तराखंड और बाद में पूरे भारत में निजी स्कूलों की फीस व शिक्षा‑संबंधी व्यवसाय पर सख्त नियंत्रण लगे, जिसमें पारदर्शी टैरिफ‑स्कीम, खुली जांच‑प्रणाली और अभिभावकों की शिकायतों का त्वरित निपटारा शामिल हो। इस आंदोलन को यह भी संदेश देना है कि जब तक जनता अपनी आवाज़ नहीं उठाएगी, शिक्षा को “शिक्षा‑व्यापार” बनाकर लाभ कमाने वाले लोग अपने मनमाने तरीकों से काम चलाते रहेंगे।
इस ज्ञापन के माध्यम से जहाँ उपजिला अधिकारी से एक स्पष्ट नीति और नियंत्रण व्यवस्था की मांग की गई है, वहीं भविष्य में लगातार जन‑आंदोलन की चेतावनी भी साफ रूप से दे दी गई है, ताकि शिक्षा को वापस बच्चों के हक के रूप में लौटाया जा सके।

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