March 25, 2026
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वैदिक अध्ययन – भारतीय ज्ञान परंपरा में कुलपति: प्रो०दिनेश चन्द्र शास्त्री

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भारतीय सभ्यता, संस्कृति, और दार्शनिक सोच की जड़ों को समझने में सहायता करता

नैनीताल। “वैदिक अध्ययन – भारतीय ज्ञान परंपरा में”-प्रो०दिनेश चन्द्र शास्त्री,कुलपति उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार ने अपने व्याख्यान में कहा कि यह अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है, जो भारतीय सभ्यता, संस्कृति, और दार्शनिक सोच की जड़ों को समझने में सहायता करता है।
वैदिक साहित्य भारतीय ज्ञान परंपरा का सबसे प्राचीन और मूल स्रोत है। इसमें मुख्यतः चार वेद आते हैं:ऋग्वेद – स्तुतियों और देवताओं के मंत्र
यजुर्वेद – यज्ञ और अनुष्ठानों से संबंधित मंत्र
सामवेद – संगीतात्मक मंत्र अथर्ववेद – औषधि, जीवन शैली, और
जादू-टोने से संबंधित ज्ञान वेदांग और उपवेद:
वेदांग (6): शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, और ज्योतिष – ये वेदों को समझने के उपकरण हैं।
उपवेद: आयुर्वेद (ऋग्वेद से), धनुर्वेद, गंधर्ववेद, अर्थशास्त्र – व्यवहारिक ज्ञान की शाखाएँ। दर्शन और विचारधारा:
वैदिक अध्ययन केवल अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, यह दर्शन, नीति, अध्यात्म और सांसारिक जीवन के समन्वय को भी दर्शाता है। उपनिषदों में आत्मा, ब्रह्म, और मोक्ष के गहन विचार मिलते हैं।
वेदांत, सांख्य, योगदर्शन इसी परंपरा में विकसित हुए। सामाजिक एवं नैतिक शिक्षा:
वेदों में वर्ण व्यवस्था, जीवन के चार पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष), और आश्रम व्यवस्था (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास) का विवरण मिलता है – जो समाज के संतुलन हेतु बनाए गए थे।
भारतीय ज्ञान परंपरा में योगदान:
गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, स्थापत्य, कृषि आदि क्षेत्रों में वैदिक ज्ञान ने आधार प्रदान किया।
भाषा, संगीत, और काव्य की मूल प्रेरणा भी वेदों से ही मानी जाती है और वहाँ लिखित रूप में विद्यमान भी है, जैसा कि कहा गया है- पश्य देवस्य काव्यं न ममार न जीर्यति।। सामवेद संगीत विद्या का प्राचीन इतिहास है। व्याख्याता डाॅ राज मंगल यादव ने वैदिक कालीन समाज एवं परिवार, वैदिक युगीन गुरुकुल परम्परा एवं वैदिक यज्ञों के महत्व पर अपना व्याख्यान दिया। उन्होंने अपने व्याख्यान में कहा कि वर्तमान समाज यदि अपनी सामाजिक एवं सांस्कृतिक उन्नति चाहता है तो उसको वेदों के द्वारा प्रदत्त ज्ञान की ओर उन्मुख होना पडेगा। वेदों में वर्णित परिवार और समाज व्यवस्था पारस्परिक सौहार्द की शिक्षा प्रदान करती है। माता- पिता, भाई-बहन, पति- पत्नि तथा अन्यान्य परिजनों का कैसा माधुर्यमय पारस्परिक व्यवहार आपस में होना चाहिए, यह सब बातें वैदिक साहित्य में भलीभाँति वर्णित हैं। संगच्ध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् का वैदिक सन्देश आज के अधुनातन समाज के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण और उपादेय है। अनुव्रत: पिता पुत्रो मात्रा भवतु संमना: । जाया पत्ये मधुमतीं वाचन वदतु शन्तिवाम्।। इत्यादि वचनों के द्वारा जो वैदिक शिक्षा दी गई है, वह सदा सर्वदा समाज और राष्ट्र का लोकमंगल करती रहेगी।
डाॅ०ओमकार ने अपने व्याख्यान में कहा कि समग्र वैदिक वाड्मय में विज्ञान के स्रोत विद्यमान हैं। भौतिक विज्ञान के अन्तर्गत आगत जो सौर ऊर्जा का विवेचन, रसायन विज्ञान के अन्तर्गत जलशक्ति के द्वारा विद्युत उत्पादन, रस एवं पारद पदार्थों का विवेचन, द्रव्य एवं उर्जा का पारस्परिक परिवर्तन होना आदि जो आज आधुनिक विज्ञान कहता है, उनके स्पष्ट उल्लेख वेदों में विद्यमान हैं।
इस कार्यक्रम का सफल एवं सुन्दर संचालन- डॉ ० प्रदीप कुमार ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ० सुषमा जोशी ने किया। प्रस्तुत कार्यक्रम दो दिनों तक चलेगा। आज और कल गुरुवार तक चलने वाले इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में भारतीय ज्ञान परम्परा से सम्बद्ध विषय वैदिक अध्ययन पर गणमान्य अतिथियों सहित विभाग की आचार्यों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों के समक्ष परिचर्चा भी की गयी। यह समग्र कार्यक्रम अपने परिपूर्ण रूप में इतनी दिव्यता एवं भव्यता के साथ इसलिए सम्पन्न हो पाया कि इसके संयोजन में संस्कृत विभाग की कर्मठ एवं स्वकार्य निष्ठा सम्पन्न अध्यक्ष प्रोफेसर जया तिवारी जी का वरदहस्त था। प्रोफेसर तिवारी विभाग की समग्र उन्नति एवं विकास के लिए सदैव तत्पर रहती हैं, यह उनकी अपनी औदार्य दृष्टि है । इस सारस्वत कार्य में प्रोफेसर शालिम तबस्सुम, प्रोफेसर शहराज अली, डॉo लज्जा भट्ट, शोधच्छात्रा भावना काण्डपाल और किरन आर्या ,सौरभ, शोभा आर्या, यशपाल, यशपाल आर्या, भारती सुयाल, अमर जोशी, जगदीश का पूर्ण सहयोग रहा। बी0ए0, बी 0एस0सी0, बी0कॉम0 बी0कॉम0 चतुर्थ सेमेस्टर के को करिकुलर कोर्स के लगभग 300 विद्यार्थी उपस्थित थे।

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