श्री नीम करोली महाराज का जन्म दिन आज



श्री नीम करोली महाराज जी की 125वीं जयंती पर लेखिका डा. कुसुम शर्मा की एक रिपोट
संपादक:-



कुसुम जी, लोग कहते हैं कि महाराज जी के पारिवारिक जीवन के बारे में बहुत कम जानकारी मिलती है। आपने यह सब कैसे जाना?
डॉ. कुसुम शर्माः
यह मेरे लिए सचमुच बड़े सौभाग्य की बात है कि श्री महाराज जी की सुपुत्री, श्रीमती गिरिजा भटेले जी, ने खुद मुझे उनके जीवन की वे बातें बताईं जो पहले कभी सामने नहीं आईं। उनके द्वारा सुनाए गए किस्से इतने जीवंत थे कि मुझे लगा जैसे मैं उसी समय में पहुँच गई हूँ और अपने सामने सब कुछ घटते देख रही हूँ। उनके मार्गदर्शन के बिना मैं यह पुस्तक लिख ही नहीं सकती थी।
संपादक:-
उनका जन्म और परिवार कैसा था? उनके दादा-दादी के बारे में भी लोग बहुत जानना चाहते हैं।
डॉ. कुसुम शर्माः
महाराज जी का जन्म 30 नवंबर 1900 (तिथि अनुसार मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि) को उत्तर प्रदेश में फिरोजाबाद के पास अकबरपुर गाँव में हुआ। उनका परिवार बहुत ही संस्कारी और विद्वान था।
उनके दादा पंडित ज्ञानचंद्र शर्मा जमींदार होने के साथ-साथ वेदों के महान ज्ञाता थे। दादी श्रीमती सरस्वती देवी शर्मा संस्कृत और शास्त्रों में पारंगत थीं।
पिता वेदाचार्य पंडित दुर्गा प्रसाद शर्मा, अनुशासनप्रिय धार्मिक और विद्वान व्यक्ति थे और माता कौशल्या देवी अत्यंत करुणामयी और धर्मपरायण महिला थीं।
ऐसे माहौल में पढ़े लिखे बालक लक्ष्मी नारायण शर्मा (महाराज जी के बचपन का नाम) बचपन से ही धार्मिक, आध्यात्मिक, भावुक और अत्यंत दयालु प्रवृति के अवतार स्वरूप थे।
श्री नीम करोली महाराज का जन्म दिन आज, श्री…
संपादक:-
उनके बचपन और पढ़ाई से जुड़ी कौन-सी बातें आपको सबसे खास लगती हैं?
डॉ. कुसुम शर्माः
वे बचपन से बहुत साधारण, जिज्ञासु और बहुत ही आध्यात्मिक थे। गाँव में शुरुआती पढ़ाई के बाद उन्हें बनारस भेजा गया, जहाँ उन्होंने वेद और संस्कृत पढ़ी।
लेकिन तभी उनकी माता के स्वर्गवास ने उन्हें भीतर से बहुत दुखी कर दिया। यही दुख आगे चलकर उनकी आत्मा को और गहराई की ओर ले गया।
संपादक:-
बहुत कम उम्र में विवाह हुआ। इसके बाद क्या हुआ?
डॉ. कुसुम शर्माः
हाँ, सिर्फ 11 साल की उम्र में उनका विवाह 9 साल की रामबेटी जी से हुआ। लेकिन उनका मन परिवार में नहीं लगा। लगभग 12-13 साल की उम्र में वे आध्यात्म की खोज मे घर से निकल।
और कई वर्षों तक साधनारत जीवन जीते हुए
घने जंगल, पर्वतों और विभिन्न आश्रमों में जीवन व्यतीत करते रहे।
कहीं बाबा लक्ष्मण दास,
कहीं तिकोनिया बाबा,
कहीं तलैया बाबा,
अब लोग उन्हें अलग-अलग नामों से बुलाने लगे; और एक नाम नीब करोरी गांव के भक्तों से मिला जो नाम आज पूरे विश्व में श्री नीम करोली महाराज जी के नाम से भक्तों में प्रसिद्ध है।
नीब करौरी बाबा,
संपादक:-
उधर उनके परिवार और पत्नी का जीवन कैसा रहा? यह भी कहा जाता है कि पिता स्वयं उन्हें घर वापस लेकर आए थे।
डॉ. कुसुम शर्माः
जी हाँ, यह बहुत भावुक घटना है। जब महाराज जी घर छोड़कर चले गए, बहुत खोज हुई, पर कोई पता न लगा। पत्नी रामबेटी जी अपने मायके बादाम बाँस चली गईं। वहाँ उन्होंने पति के लौटने की आशा में एक तपस्विनी जैसा जीवन शुरू कर दिया; रोज सुबह शिव मंदिर में जल चढ़ाना, दिन में सिर्फ एक बार
भोजन करना और मन में अटूट विश्वास रखना की पति शीघ्र ही लौट आएंगे।
एक दिन तीज के त्योहार पर कुछ महिलाओं ने उनका मज़ाक उड़ाया कि वे पति के बिना ही तीज क्यों मना रही हैं?, जिससे वे बहुत दुखी हो गईं और शिव मंदिर में रोकर प्रार्थना करने लगीं। उसी दिन चमत्कृत रूप से गंगा किनारे किलाघाट पर महाराज जी के पिता, पंडित दुर्गा प्रसाद शर्मा, उनसे मिले और समझाकर उन्हें घर वापस ले आए।
यहीं से उनके गृहस्थ जीवन की नई शुरुआत हुई।
संपादक:-
इसके बाद उनका गृहस्थ जीवन कैसा रहा?
उनके बच्चों के बारे में बताइए।
डॉ. कुसुम शर्माः
घर लौटने पर महाराज जी सा सम्मान अपनी पत्नी को 10 वर्षों बाद वापस अकबरपुर हवेली में के आए। रामबेटी जी का बहुत सम्मान किया और दोनों ने मिलकर नया जीवन शुरू किया।
उनके तीन बच्चे हुए -श्री अनेग सिंह शर्मा,
श्री धर्मनारायण शर्मा,
और पुत्री श्रीमती गिरिजा शर्मा (भटेले)।
सबसे विशेष बात यह रही कि जहाँ एक ओर वे एक आदर्श पति, पिता और पुत्र बने, वहीं दूसरी ओर उनकी आध्यात्मिक यात्रा भी चलती रही। भक्तों को उनके परिवार के बारे में पता नहीं था और परिवार को उनके चमत्कारिक जीवन की गहराई का अंदाज़ नहीं था; यह उनकी साधना की माया भी थी और करुणा भी।
संपादक:-
अम्मा रामबेटी जी को आप कैसे देखती हैं?
उनका योगदान कितना महत्वपूर्ण है?
डॉ. कुसुम शर्माः
अम्मा रामबेटी जी महाराज जी की सबसे बड़ी सहारा थीं।
उनके धैर्य और त्याग ने ही महाराज जी को गृहस्थ और आध्यात्मिक-दोनों जीवन सहजता से जीने दिया। जब महाराज जी यात्राओं पर रहते, तब पूरा परिवार, खेती, जमींदारी, गाँव के लोग, सब अम्मा ही संभालती थीं।
अम्मा का जीवन हमें यह सिखाता है कि साध सिर्फ जंगल में नहीं होती- घर-परिवार निभाना
भी एक बहुत बड़ी तपस्या है।
संपादक:-
महाराज जी के आश्रम भारत और विदेशों में किस तरह लोगों को जोड़ते हैं?
डॉ. कुसुम शर्माः
भारत में उनके प्रमुख आश्रमों में हैं.. कैंची धाम, हनुमानगढ़ी, भूमियाधार, काकड़ीघाट और वृंदावन, पिथौरागढ़, पनकी मंदिर कानपुर, हनुमानसेतु लखनऊ, हनुमानमंदिर शिमला, दिल्ली में महरौली, जौनपुर बेला रोड, धारचूला, जिब्ती, बीरापुरमआज, गर्जिला, बद्रीनाथ, ऋषिकेश करोड़ों लोगों भक्तों की आस्था के केंद्र हैं।
इन स्थानों पर हर आने वाला भक्त अपने भीतर एक अनोखी शांति महसूस करता है।
विदेशों में, इंग्लैंड अमेरिका के ताओस आश्रम और वहाँ की भक्त-समुदायों में महाराज जी की महिमा आज भी उतनी ही जीवित है।
रामदास, कृष्णदास और लैरी ब्रिलिएंट जैसे लोगों ने उनकी बातें पूरे विश्व तक पहुँचाईं। उन्नने कारण भारतीय अध्यात्म दुनिया में और भी सम्मानित हुआ।
संपादक:-
और अंत में- आज की पीढ़ी को श्री महाराज जी से क्या मुख्य संदेश मिलता है?
डॉ. कुसुम शर्माः
महाराज जी हमेशा कहते थे-“गृहस्थ जीवन ही सबसे बड़ी तपस्या है।” वे प्रेम, सेवा और भोजन कराने को सबसे ऊँची भक्ति मानते थे।
उनका विश्वास था कि-
“भूखे को भोजन, दुखी को ढाढ़स, और सबके लिए प्रेम, यही धर्म है।”
आज 125 साल बाद भी श्री महाराज जी का यही संदेश सबसे महत्वपूर्ण है कि जीवन सरल हो, प्रेम से भरा हो, और सेवा से परिपूर्ण हो।
यही मनुष्य का सच्चा मार्ग है।




















